
वट सावित्री पर्व में, नारी रख उपवास।
आयु भार्य की दीर्घ हो ,रखकर मन में आस।।
कर सोलह शृंगार स्त्री, पूजे वट श्रीमान।
वस्त्र दीप का दान कर, माँग रही वरदान ।।
पावन बरगद पेड़ में ,तीन देव का वास।
विधि विधान से पूज कर, करती दुख का नास ।।
नारी साहस धैर्य को,दर्शाए यह पर्व।
बाँच सावित्री की कथा , करें सुहागिन सर्व।।
निभा गई नारी बहुत, सदी पुरानी रीत।
बड़े प्रेम से हर घड़ी, नाता जोड़े प्रीत ।।
एक पर्व ऐसा नहीं, हो भार्या के नाम।
वर्षों से मन में उठे, प्रश्न सुबह अरु शाम।।
भेद भाव चलता रहा ,नारी से हर बार।
है असीम त्यौहार में,कोई इक त्यौहार।।।
कभी दीप बनकर जली, कभी शिला सम मौन ।
ढली सदा हर रंग में, हाल पूछता कौन।।




