साहित्य

दूर हो जाने से 

 मनोज कुमार

कितनी तड़प होती है

यादें आहें भरती है

आँखें डूब जाती है

दूर हो जाने से _

 

रातें खामोश रहती है

नींदें यूँ ठिठकती है

कुछ महसूस होते हैं

मिले कैसे हम उस दिन

यही हम सोचते हैं

दूर हो जाने से _

 

प्यास न भूख लगती है

साँसे यूँ ही मचलती है

चैन में खलल पड़ते हैं

बेवजह ग़म सताते हैं

दूर हो जाने से _

 

मनोज कुमार यकता

गोण्डा उत्तर प्रदेश

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