साहित्य

गीत

संगीता श्रीवास्तव

बिजलियाँ चमक उठी मोर नृत्य कर उठे।

आ गई साँवरी घटा कि द्वार खोल दे.

घूम. घूम संग हवा झूमने लगी घटा।

खिल उठे प्रदेश वन्य चर अचर निहारते.

 

सजीव हो उठी प्रसेदिका मगन हैं वन सघन,

बुहारने लगी हवा पीत पर्ण हो मगन।

प्रसून-वल्लरी लगी झूमने उल्लास भर,

आ रहीं सूदूर से बदलियाँ विहार कर।

 

आज मन मयूर पंख-है प्रसार नाचता

नृत्य कर उमंग भर मन गगन विहारता

मेघ से छलक कलश अमर सुहाग बाँटती।

डाल-डाल फूल पात सज गई सुभाग्य की।

 

चल पड़े बना के मेघ झुण्ड चित्र से सुदूर,

मन के हाँथ से छुआ उड़ रहे सदृश कपूर.

अल्पना गढे गगन सप्तरंग ओर छोर।

खिड़कियाँ दलान द्वार पार मन उडा चकोर।

 

कुछ अलि ने कहा कान में कली के और

खोल पट घूँघट निहारने लगी अलि बिभोर

झूमने विहग लगे प्रसूनवन विहार कर।

आ रही हैं बदलियाँ निशीथ भर शृंगार कर।

 

संगीता श्रीवास्तव शिवपुरी

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