साहित्य

पावस

पूर्णिमा सुमन

घिर-घिर घन अम्बर में छाए, श्यामल छवि सुखधाम।

हरित चुनरिया ओढ़ धरा ने, पाया नव विश्राम॥

 

सूखे तरु की जड़ चेतन हुई, जागे सुप्त विहान।

बूँदों ने मुरझाए मन में, भर दी नव मुस्कान॥

 

रिमझिम जल की मधुर रागिनी, गूँजे आठों याम।

पात-पात पर मोती झिलमिल, रचते छवि अभिराम॥

 

कल-कल करती सरिता बहती, गाती जीवन-गान।

खेतों में लहराते अंकुर, लेकर नव अरमान॥

 

सौंधी-सौंधी गंध धरा की, महका सकल जहान।

मंद पवन पायल झनकाती, पुलकित हुआ विहान॥

 

मोर पंख विस्तार नाचते, दादुर देते तान।

प्रकृति-प्रिया के मंगल उत्सव में, गूँजे मधुर गान॥

 

पावस केवल जल न बरसाए, देता नव संदेश।

सूखे मन में प्रेम उगाकर, बदले सकल परिवेश॥

 

बूँद-बूँद में सृजन छिपाए, यह प्रकृति का दान।

पावस आकर स्मरण कराता, नित नव होता प्राण॥

 

पूर्णिमा सुमन

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