साहित्य

जानवरों की पुकार

सपना कुमारी

एक बकरी उदास बैठी अपनी किस्मत पर आँसू बहा रही थी।

पास खड़ी भैंस ने पूछा, “क्या हुआ बहन? इतनी दुखी क्यों हो?”

बकरी ने भारी मन से कहा, “बकरीद आने वाली है। पता नहीं इस बार ज़िंदा बचूँगी भी या नहीं। मेरे कितने ही भाई-बहनों को लोग मारकर खा गए। माँ-बाप का भी पता नहीं कहाँ हैं। इंसान तो बहुत हैवान बन गया है। मैं तो सिर्फ़ घास खाती हूँ, किसी का क्या बिगाड़ती हूँ? फिर भी मेरी जान का दुश्मन क्यों है? इंसानों को जानवरों का मांस ही क्यों अच्छा लगता है?”

बकरी की बातें सुनकर भैंस भी उदास हो गई। उसने धीमी आवाज़ में कहा, “क्या बताऊँ बहन… हमारी ज़ुबान नहीं है, इसलिए अपना दर्द किसी से कह भी नहीं सकते। पिछली बार मुझे कामाख्या मंदिर में बलि के लिए ले जाया जा रहा था। लेकिन शायद मेरी किस्मत अच्छी थी, मौका मिलते ही मैं भाग निकली और मेरी जान बच गई।”

तभी पास खड़े दूसरे जानवर भी इकट्ठा हो गए। सबकी आँखों में डर और दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।

एक बूढ़ी गाय बोली, “दुख की बात तो यह है कि आज इंसान सिर्फ़ जानवरों पर ही नहीं, बल्कि इंसानों पर भी अत्याचार करने लगा है। जब इंसान ही इंसान का नहीं हो पा रहा, तो हमारी रक्षा कौन करेगा?”

यह सुनते ही वहाँ सन्नाटा छा गया। सभी जानवर एक-दूसरे की ओर देखने लगे। किसी के पास कोई जवाब नहीं था।

उस दिन जंगल में ऐसा मातम छाया कि मानो हर बेजुबान जीव एक ही सवाल पूछ रहा हो—क्या धरती पर जीने का अधिकार सिर्फ़ इंसानों का ही है, या हम बेजुबानों का भी?

नाम_ सपना कुमारी कोल्हापुर

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