
43 वें वैवाहिक दिवस पर धर्मपत्नी आभा को समर्पित कविता
43 साल पहले जब थामा था तेरा हाथ,
तब जाना था *आभा*, तू है मेरे जीवन का साथ।
तेरे नाम से ही रोशन है मेरा हर एक दिन,
तेरी हंसी से महकता है ये घर-आंगन।
*आभा*, तेरी आंखों में बसती है मेरी दुनिया,
तेरी बातों में छुपी है मेरी हर खुशी की कविता।
सुबह की चाय से लेकर रात की बातों तक,
हर लम्हे में शामिल है तेरा प्यार बेबाक।
कभी माथे पे शिकन, कभी ममता भरी डांट,
*आभा* तेरे बिना अधूरा है ये जीवन का पाट।
बच्चों को संभाला, रिश्तों को संवारा,
तेरे त्याग से ही तो बना ये घर हमारा।
43 बसंत देखे, देखीं 43 पतझड़,
पर *आभा* तेरे साथ का एहसास आज भी है नवल।
तेरी मांग का सिंदूर, हाथों की मेंहदी,
गवाही देते हैं कि मोहब्बत हमारी नहीं है आधी।
आज सालगिरह पर बस इतना कहना है,
*आभा*, तू अनमोल है, ये हर सांस को कहना है।
रब से दुआ है, अगले जन्म भी तू ही मिले,
सात फेरों के साथ, सात जन्मों का वादा खिले।
*43वीं सालगिरह मुबारक हो मेरी आभा*




