
गुनाह करके भी जब हाथ उठा दिए मैंने,
बिना सवाल ही सारे मिटा दिए उसने।
कहा न उसने कभी क्यों ख़ता हुई तुमसे,
मेरे सुबकते ही आँसू सुखा दिए उसने।
जहाँ में लोग तो ज़िल्लत की ढूँढते हैं वज़ह,
मेरे तो ऐब भी पर्दों में छुपा दिए उसने।
मैं थरथराती हुई आ गई थी चौखट पर,
गले लगा के अँधेरे भगा दिए उसने।
तमाम उम्र की पाकीज़गी एक तरफ़,
वो एक पल में जो रस्ते दिखा दिए उसने।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




