साहित्य

बरखा,हरियाली और प्रेम का संदेश

संगीता वर्मा

छाई घटा, भीगी धरा, महकी पवन बयार,

बरखा की बूंदों में घुला है मीठा-मीठा प्यार।प

त्तों पर मोती सजे, धरती ने ओढ़ी धानी चूनर,

हरियाली के आँगन में, खिली है प्रीत की चुनर।

 

माटी की खुशबू उठी, जैसे तेरा ही हो संदेश,

मिलन की इस रुत में, सँवर गया मेरा हर वेश।

भींगते हैं तन-मन यहाँ, धड़कनें जाती हैं मचल,

बरखा और हरियाली का यह मौसम, है प्रेम का महाँचल।

 

इस मौसम की मदहोशी में, मेरा भी बस यही पैगाम,

बरखा की बूँदें तुम पर बरसाएं खुशियों का मुकाम।

बरखा आई, संग अपने जल अपार लाई, सूखे खेत-खलिहानों में हरियाली लाई।

 

तपती धरती की आग बुझाई,

बरखा संग अपने कृषकों के मुस्कान लाई।

सूख रहे पेड़ों में. मस्ती-सी छलकाती आई है,

बरखा, बिजली का झूल गया रेशमी अंगरखा।

 

कुहरे की नरम-नरम चादरें लपेटे, सूरज भी दुबक गया धूप को समेटे। कैसे टिकता, आखिर बोझ था उमर का!

बादल की बादल से हो लड़ाई,

बरखा हरियाली और प्रेम संदेश

लाई।

 

स्वरचित मौलिक

संगीता वर्मा, कानपुर उत्तर प्रदेश

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