साहित्य

दो जून की रोटी

डाॅ सुमन

दो जून की रोटी, जीवन की जरूरत।

जिसके लिए लोग, दिन-रात मेहनत करते।

 

भूखे पेट की आग, ज्वाला से धधकती धरती,

दो जून की रोटी मांग रही,भूखे पेट की आग।

 

दो जून की रोटी, पेट भरने का साधन।

जिसके लिए लोग, संघर्ष करते अनवरत।

 

दो जून की रोटी, जीवन की प्राथमिकता।

जिसके लिए लोग, अपना सब कुछ न्योछावर करते।

 

कैसे रहते होंगे सड़कों के किनारे मजदूर ये,

दिल में अजीब सा एहसास होने लगता है।

 

खाली कटोरा,भूखे बच्चों की सिसकती आवाज,

एक अरमान दिल में,सोए न भूखा माँ का लाल।

 

समाज की भूल कहूँ या मतलबपरस्ती इसे।

अमीरी – गरीबी की खाई पाटने लगता हूँ।

 

एहसास जिन्हें नहीं होता गरीबी का तनिक भी

मैं उन लोगों को रात – दिन कोसने लगता हूँ।

 

दो जून की रोटी भी जिन्हें कभी होती नहीं नसीब।

पुरोहित उन बस्तियों में रोशनी खोजने लगता हूँ।

 

दो जून की रोटी, हर कोई चाहता।

लेकिन सबको मिले, ऐसा नहीं होता।

 

दो जून की रोटी, जीवन की सच्चाई।

जिसके लिए लोग, हर दिन संघर्ष करते।

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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