
जब-जब बरसे सावन की रिमझिम,
और भीगे सारा गाँव-शहर,
मुझे याद आता है वो माँ की छाँव,
जहाँ मिलता है सब दुखों से मुक्ति
का मरहम वर्षा पसारे पाँव।
बिजली चमके, डराए बादल,
काँप उठे जब तन और मन,
दौड़ कर मैं छुप जाता था,
माँ, तेरी गोद के उस पावन वन।
तूफ़ान हो या तेज हो बारिश,
हर तूफ़ान को तू सह लेती थी,
माँ, अपने आँचल में छुपा कर,
मुझको दुनिया की हर नज़र से
बचा लेती थी।
भीगने न देती थी एक बूँद भी,
खुद को भले ही तू भीगा लेती थी,
तेरा आँचल ही मेरी सबसे बड़ी छत थी,
जहाँ ममता की बारिश होती थी।
आज भी जब होती है बारिश,
ढूँढता हूँ वही आँचल, वही छाँव,
पर अब वो सुकून कहाँ मिलता है,
जो मिलता था माँ, सिर्फ तेरी बाहों
में पाँव और माँ की आंचल की छाँव।
स्वरचित एवं मौलिक ✍️
संगीता वर्मा, कानपुर उत्तर प्रदेश




