
आज व्यथित है मन मेरा,
दिल को बहुत समझाई हूं।
लिखना बहुत चाही मगर,
शब्दों को जोड़ ना पाई हूं।
बैठ अकेले में आंखों से,
नीर बहुत बहाई हूं।
कि कोशिश उस बच्ची का
दर्द नहीं लिख पाई हूं।
मर गई थी संवेदना उनकी,
वेदना उसकी समझ ना पाए।
मासूम सी उस बच्ची को,
सारे नोच नोच कर खाए।
लानत है उन मर्दों पर जो,
बेटी को बेटी समझ नहीं पाए।
लेकर रूप घिनौना अपना,
एक बेटी को मसल आए।
क्या कुसूर था उसका,
बस इतना बतला दो।
अपनी जनी बेटी पर भी,
वैसी ही नज़र गड़ा दो।
चीर के रख देगी वो मां,
अपने हाथों अपना सिंदूर मिटा देंगी।
तुम्हे मारने को वहशी दरिंदे,
दुर्गा, काली वह बन जाएगी।
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बंदना मिश्रा
देवरिया उत्तर प्रदेश




