साहित्य

रिमझिम बरसे वर्षारानी

डॉ. शिवनाथ सिंह

रिमझिम बरसे वर्षारानी, चम चम चमके बिजुरिया ना

टप टप टपके मोरि कोठरिया, सजनवा घर ना आये ना

 

लिखि लिखि पतिया बहुत भेजाई, कउनो सुधिया लींन्हो ना.

बलमा छाये रहे परदेशवा, मोरि खबरिया लींन्हो ना ..

 

पपिहा पिउ पिउ रटनि लगावै जियरा हूक बढ़ावे ना .

दादुर टर्र टर्र गोहरावें सावन ऋतु मन भावे ना ..

 

आँगन बरसे बागन बरसे, नदी नाले उफ़नाये ना

भूलइ दिवस ना रैन सुरतिया, पिय की याद सतावे ना ..

 

रहि रहि मोर करेजवा धड़के, कैसे कहूं विपतिया ना .

गरजे बरसे बहुत बदरवा हमका बहुत डरावे ना ..

 

अँखिया पथराईं बाट जोहत, देहियाँ क़सक जगावे ना .

कागा बोले डारि पे बैठे,कबहुँ सन्देसा लावें ना ..

 

चूड़ी कंगन परे सब सूने, बिन्दिया मोहि सोहावे ना .

सइयाँ बिन सिंगार सब फीके, दर्पन मोहि चिढ़ावे ना ..

 

मइया से पूंछू बाट बतावो, कइसे जिय समझावें ना .

सावन बीता आय गयो भादो, प्रीतम अबहुँ घर आवै ना ..

 

बिरहा की आगि कलेजवा जारै, आँसू धारा बहावे ना .

ईश्वर अरज करौं हम तुमसे, पिय की खबरिया आवै ना ..

 

बदरा घिर ” शिव ” घुमड़त आवै बिजुरी से तन मन हरषै ना .

पिय बिनु रात कटे ना काटे, विरहिन जियरा डासै ना ..

 

*डॉ. शिवनाथ सिंह “शिव”*

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