साहित्य

एक मोड़ ऐसा भी

नीलम अग्रवाल "रत्न"

मेरे पति का तबादला हुआ था । नई जगह अभी बहुत किसी से परिचय नहीं हुआ था । मेरे घर के पास ही दुर्गा मंदिर थी । रोज शाम को आरती की घंटी बजती । आरती की आवाज मेरे घर तक साफ -साफ सुनाई पड़ती थी। एक शाम यूँ ही आरती के समय मैं भी मंदिर गई । आरती पूर्ण हुई । प्रसाद लेकर मैं घर जाने के लिए मुड़ी तभी किसी ने कहा पंडी जी इसका भी भोग लगा दीजिए । यह आवाज सुनकर मैं चौंक गई । मुझे आवाज कुछ जानी पहचानी सी महसूस हुई मैंने मुड़ के देखा तो उछल पड़ी । अरे मोनी तू !
यूँ अपना नाम सुन मोनी भी चौंक गई। हमारी नजर मिलते ही वह भी मुझे पहचान गई ।
हम दोनों एक कक्षा में, एक ही स्कूल में पढ़ते थे । मैं तो पढ़ाई में ठीक ठाक थी । लेकिन मोनी पढ़ाई में बहुत अच्छी थी । और आज हम काफी अर्से बाद मिले थे । लेकिन दोनों एक दूसरे को तुरत आवाज से ही पहचान गए ।
इसलिए उसने भी चहकते हुए कहा, उषा तू यहाँ कैसे ?
कब से है तू इस शहर में ?
तू कहाँ रहती है ?
किसी रिश्तेदार के घर आई है क्या ?
ऐसे कई सारे सवालों की झड़ी लगाती हुई मुझसे गले मिलने लगी ।
मैंने कहा, अरे मुझे भी कुछ बोलने का, कुछ पूछने का मौका तो दे । तुझे सब बताती हूँ । जब मैंने बताया कि मेरे पति का तबादला इस शहर में हुआ है ।
अभी कुछ ही दिन हुए हैं यहाँ आए । और मैंने अपने घर का पता बताया । तब उसने कहा, अरे मेरा घर भी तो यहाँ पास में ही है ।
चल ! मेरे घर चल । साथ में चाय पियेंगे और ढेर सारी बातें करेंगे । कितने सालों बाद मिले हैं हम दोनों ।
मेरे पति भी आज ऑफिस के काम से बाहर गए हुए थे । तो मुझे भी किसी काम की जल्दी तो थी नहीं । सो मैं भी उसके साथ चल दी ।
उसका घर देख कर मुझे बहुत अच्छा लगा । मैंने कहा मनीषा तेरा घर कितना व्यवस्थित और सुसज्जित है । मेरे तो बच्चे भी यहाँ नहीं रहते । तो भी मेरा घर तो हमेशा चिड़िया घर बना रहता है । इस बात को लेकर अक्सर मुझमें और मेरे पति में नोक झोंक होती रहती है । इन्हीं सब बातों में कब दो घंटे निकल गए , पता ही नहीं चला ।
उसका घर देखकर मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि ये मोनी का घर है । क्योंकि मोनी के पिता किसान थे । परिवार में मोनी के दादा दादी सहित नौ सदस्य थे। घर के हालात बहुत तंग थे । मोनी घर की सबसे बड़ी बेटी थी । गरीबी के कारण पिता पर कर्ज बहुत ज्यादा हो गया था। उसी का फायदा उठाकर तैतालीस साल के विधुर साहूकार ने कर्ज के बदले मोनी से शादी करने की शर्त रखी थी ।
मोनी उस समय लगभग चौदह साल की रही होगी । लेकिन इसके पिता ने हालात के आगे घुटने टेक दिए और मोनी की शादी उस बूढ़े साहूकार से कर दी थी ।
साहूकार तो मोनी को अच्छी तरह से रखना चाहता था । लेकिन उसकी माँ को तो मुफ्त की एक आया मिल गई थी । मोनी की शादी के बाद वह मायके बहुत कम ही आती थी । और आती भी तो एक दो दिन के लिए ही आती थी । इस लिए मोनी के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी मुझे नहीं थी ।
और आज अचानक मोनी को इतनी खुश और उसका रंग ढंग देखकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा था ।
उसके कमरे में ड्रेसिंग टेबल पर रखी फोटो फ्रेम में मोनी के साथ किसी नौजवान की फोटो लगी थी । मुझे लगा शायद उसका बेटा होगा । लेकिन जब मोनी ने बताया कि ये मेरे पति हैं तो मुझे झटका सा लगा । और मैं फटी आँखों से उसे देखने लगी ।
तब उसने विस्तार से सब बताया कि_
शादी के दो तीन साल बाद ही साहूकार को कोई खतरनाक बीमारी हो गई थी । उन्हें पता चल गया था कि उनके पास ज्यादा समय नहीं है । तब उन्होंने ही अपने एक रिश्तेदार के बेटे से मेरी दूसरी शादी करवाने के फैसला लिया था । मेरे पहले पति को लगता था कि उन्होंने मुझ नाबालिग से शादी कर के मुझपर अत्याचार किया है । इसी कारण भगवान ने उन्हें सजा दी है । इसलिए उन्होंने अपनी गलती सुधारने के लिए ही मेरी जोड़ी के लड़के से मेरी शादी करवाई । बस वहीं से मेरे जीवन में ऐसा मोड़ आया, जहाँ मुझे सिर्फ खुशियाँ ही खुशियाँ मिली ।
मेरे दूसरे पति बहुत अच्छे हैं । ये मेरे मायके वालों की भी बहुत मदद करते हैं । इनके परिवार में भी सभी लोग बहुत भले हैं । मुझे बहुत मानते हैं ।
ऊषा तू तो जानती है मुझे पढ़ने की कितनी शौक थी । जब मेरे पति को ये बात पता चली तो उन्होंने मुझे आगे पढ़ने का भी मौका दिया ।अभी मैं बीटेक की तैयारी कर रही हूँ ।
मोनी की नई जिंदगी के बारे में जानकर मेरे मन को बहुत ठंडक मिली । मुझे उसके लिए बहुत अच्छा लगा ।

नीलम अग्रवाल “रत्न” बैंगलोर
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