साहित्य

स्वाधीनता संग्राम क्रांतिकारी खुदीराम बोस

डॉक्टर शशिकला

पिता त्र्यलोक्यनाथ बोस -माता लक्ष्मीप्रिया देवी के पुत्र, खुदीराम बोस क्रांतिकारी महान ।

माता- पिता का बचपन में हुआ देहांत ,बहन ने पालन पोषण किया, दी वीरता की पहचान।

नवी कक्षा पढ़ते, छोड़ा विद्यालय, स्वाधीनता के लिए जागे अरमान ।

बंग -भंग आंदोलन में कूद पड़े, रिवॉल्यूशनरी पार्टी की सदस्यता लेकर चलाया स्वाधीनता अभियान।

पंपलेट “वंदे मातरम “बांटकर भारतीयों में जगाया स्वाभिमान।

“सोनार बांग्ला” पत्रिका बांटकर जागृति लाने में दिया योगदान ।

अंग्रेजी सत्ता उनकी बनी विरोधी, खुदीराम बोस की देख बढ़ती आन- बान -शान ।

नारायणगढ़ स्टेशन पर खुदीराम बोस ने गवर्नर पर हमला किया, बनी स्वाधीनता सेनानी की पहचान ।

“वंदे मातरम” “भारत माता की जय” बोलते ,चेहरे पर रहती मुस्कान।

निर्भीक ,निडर क्रांतिकारी खुदीराम बोस ,18 वर्ष की छोटी आयु में, छुए स्वाधीनता के बडे़ अरमान ।

अरमानों की ऊंचाई छूती थी आसमान ।

हाथ में बम, दिल में स्वतंत्र हिंदुस्तान।

देश आज़ादी कीअभिलाषा ,खुदीराम बोस थे महान ।

दमनकारी जज किंग्सफोर्ड पर,प्रफुल्ल चाकी क्रांतिकारी के संग बम फेंका, बच गया किंग्सफोर्ड बेईमान ।

प्रफुली चाकी ने गिरफ्तारी से पूर्व खुद को गोली मारी ,दिया प्राणों का, स्वाधीनता के लिए बलिदान।

खुदीराम बोस गिरफ्तार हुए अभियोग लगा, बिट्रिश सत्ता ने फांसी का दिया फरमान।

जज ने पूंछी अंतिम इच्छा , बोले खुदीराम “भारत मां को आजाद देखने का है अरमान”।

राष्ट्र प्रेम की चमक में बोले” वंदे मातरम” यशगान, फांसी के फंदे पर झूले ,चेहरे पर थी मुस्कान।

खुदीराम बोस की चिता भस्म,देशवासियों ने डिबिया में रखी, दिया सम्मान।

11 अगस्त 1908 को बिट्रिश सत्ता ने खुदीराम बोस को फांसी दी ,उन्होंने दिया स्वाधीनता के लिए प्राणों बलिदान ।

अमर हैं खुदीराम बोस -अमर रहेगा उनका बलिदान।

कोटि- कोटि नमन ,अर्पित हैं श्रद्धा सुमन, क्रांतिकारी खुदीराम बोस थे महान।

रचयिता

डॉक्टर शशिकला अवस्थी इंदौर मध्य प्रदेश

रचना स्वरचित मौलिक है।

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