
मेरा मन जब उदास होता है,
सबसे पहले तेरे ही पास होता है।
तेरी तस्वीर से बातें करता हूँ,
तब कहीं जाकर थोड़ा विश्वास होता है।
आँसू निकलें जो कभी मेरे,
लगता है तेरा मन भी रोता है।
अब तो तेरी गोद नहीं मिलती,
फिर भी आँचल का एहसास होता है।
इतना क्यों करती थी मेरे लिए,
यह प्रश्न आज भी ख़ास होता है।
मैं तो खाली हाथ ही था माँ,
जो कुछ मिला, तेरा ही आशीष होता है।
जब भी दुनिया मुझे ठुकराती है,
तेरा चेहरा मेरे पास होता है।
तेरी सीख अँधेरों में दीपक बनकर,
हर कदम पर उजास होता है।
रसोई की वह सोंधी खुशबू,
आज भी घर के आसपास होता है।
तू नहीं है, फिर भी हर कोने में,
तेरा ममतामय निवास होता है।
कभी थककर जब बैठ जाता हूँ,
तेरा ही स्मरण साँस होता है।
तेरी दुआओँ की छाँव न होती,
जीवन कितना निराश होता है।
लोग कहते हैं माँ चली गई,
पर यह कैसा इतिहास होता है?
माँ तो शरीर से दूर होती है,
ममता का नहीं वनवास होता है।
आज भी तेरे चरणों में सिर रख दूँ,
बस यही मन का प्रयास होता है।
माँ, तू जहाँ भी हो, मुस्कुराती रहना,
यही मेरे जीवन का विश्वास होता है।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश




