
बेटी केवल एक संतान नहीं होती, वह घर का विश्वास होती है। उसके कदमों से आँगन में उजाला उतरता है और उसकी मुस्कान से परिवार का भविष्य सँवरता है। किन्तु जब उसी विश्वास को कोई कलंकित कर दे, और उससे भी बड़ा दुःख यह हो कि अपने ही लोग उसकी पीड़ा सुनकर मौन हो जाएँ, तब केवल एक बेटी नहीं टूटती—मानवता भी घायल हो जाती है।
बेटी है तो घर में प्रभात है, बेटी से ही मान।
उसकी आँखों का हर आँसू, करता देश हैरान।
जो उसकी रक्षा छोड़ दे, वह कैसा परिवार?
ऐसे मौन के सामने, झुक जाता सम्मान।
यह मुक्तक हमें स्मरण कराता है कि बेटी की रक्षा केवल कानून का नहीं, परिवार के चरित्र का भी प्रश्न है।
रिश्ते रक्त से बनते हैं, किन्तु उनकी पवित्रता चरित्र से सिद्ध होती है। यदि कोई व्यक्ति विश्वास का मुखौटा पहनकर किसी मासूम के सम्मान पर आघात करे, तो वह केवल अपराधी नहीं, मानवता का अपराधी है। उससे भी अधिक दुखद वह क्षण है, जब भय, लोकलाज या झूठी प्रतिष्ठा के कारण सत्य को दबा दिया जाता है। मौन, अन्याय का सबसे बड़ा सहायक बन जाता है।
चुप्पी ने जब साथ दिया, बढ़ता गया अँधियार।
सत्य अकेला रो पड़ा, हार गया परिवार।
अन्यायों की उम्र तभी, होती है लम्बी मित्र,
जब डर से झुकने लगें, साहस वाले द्वार।
यह मुक्तक बताता है कि अन्याय की सबसे बड़ी शक्ति अपराधी नहीं, बल्कि समाज की चुप्पी होती है।
समाज को यह समझना होगा कि किसी बेटी की अस्मिता, किसी परिवार की प्रतिष्ठा से छोटी नहीं होती। प्रतिष्ठा सत्य स्वीकारने में है, अपराध छिपाने में नहीं। जो घर अपनी बेटी का हाथ थाम लेता है, वही वास्तव में संस्कारवान कहलाने का अधिकारी है। न्याय में देर हो सकती है, पर न्याय की राह छोड़ देना आने वाली पीढ़ियों के साथ अन्याय है।
सम्मानों की भीड़ में, मत खो देना सत्य।
झूठ सजे सौ हार से, सच रहता है पवित्र।
जिस घर ने बेटी थाम ली, वह मंदिर बन जाए,
जो डर से आँखें मूँद ले, उसका जीवन व्यर्थ।
हर नागरिक, हर शिक्षक, हर अभिभावक और हर साहित्यकार का दायित्व है कि वह ऐसी घटनाओं पर केवल शोक न करे, बल्कि समाज में जागरूकता और साहस का दीप जलाए। बेटियों को यह विश्वास मिलना चाहिए कि यदि उनके साथ अन्याय होगा, तो उनका परिवार सबसे पहले उनके साथ खड़ा होगा, उनके विरुद्ध नहीं।
दीप जलाओ चेतना का, टूटे हर अज्ञान।
बेटी का विश्वास ही, भारत की पहचान।
कानून अपना काम करे, अपराधी लज्जित हों,
न्याय बने हर नागरिक का, सबसे पहला मान।
हम ऐसी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं जहाँ नारी को शक्ति, ज्ञान और करुणा का स्वरूप माना गया। इसलिए किसी भी बेटी के सम्मान पर आघात केवल एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे समाज पर आघात है। आइए, ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ कोई बेटी भय में नहीं, विश्वास में जी सके; कोई परिवार मौन का नहीं, साहस का उदाहरण बने; और हर अपराधी यह जान ले कि न्याय देर से सही, पर उसके द्वार तक अवश्य पहुँचेगा।
दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’
जनपद संभल उत्तर प्रदेश
सम्पर्क 8279709465



