
पिता ने मुझे पढ़ना_ लिखना सिखाया
नेक इंसान बनकर जिंदगी जीना सिखाया।
उन्होंने मुझे आगे बढ़ाने में दिया अथक योगदान
जिसके फलस्वरूप मैं बन पाया महान।
ये हैं मेरे लिए सर्वश्रेष्ठ
ये हैं मेरे लिए वरदान।
मैं उनके लिए
कभी न सह सकूंगा अपमान । ये हैं मेरी धरोहर
आंखों के तारे ।
सारे जहां से भी अद्भुत
और हैं न्यारे।
दुर्गेश मोहन
बिहटा, पटना (बिहार)




