साहित्य

कुछ स्फुट दोहे

Rakesh Chandra

भला जो देखन मैं चला, मुझसे भला न कोय।

सबके चेहरे ढँके हुए, सच रहा है सोय।।

 

यूँ तो इस संसार में है, बुरे लोगों की भीड़।

भले लोगों ने फिर भी, बना लिये कुछ नीड़।।

 

बड़े से इस संसार में, रहते लोग अनेक।

कुछ बुरे बनकर भले, रहे रोटियाँ सेंक।।

 

बुराई की हर फसल के, बीज सदा उपलब्ध।

बोये, काटे स्वयं ही, कहने को प्रारब्ध।।

 

बुराई के इस युग में, जो बदल सके अंदाज।

वही है असली सूरमा, नवयुग के तीरंदाज।।

 

कलियुग में बन गई, बुराई एक हथियार।

भला आदमी चढ़ रहा, बलिवेदी पर बारंबार।।

 

बुराई बनने की लालसा, पकड़ रही है जोर।

अच्छाई को मिले, बमुश्किल कोई ठौर।।

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