
गद्दा तकिया पाला भइनै
हाथ कै अंगूरी फूटि रही।
ओढ़ि रजाई थरथर काँपै
अपनो हिम्मति छूटि रही।।
कौड़ा के बुझि गइल आगि
रँचो भर आचि नहीं लागै।
ऊपर से तोहरे चिंता मा
महतारी राति राति जागै।।
स्नान ध्यान सब गौण भएन
बस एक लोटा में निपट रहेन।
जैसे तैसे पहिन वहिन
सब बिस्तर मा दुबकि रहेन।।
गोरु चौवा कुक्कुर बिलार
सबकेसब ठिठुरात दिखें।
कौवा करि करि कांव कांव
कहों कहों मंडरात दिखें।।
स्कूल बंद भै गलन देखि
रेलिन पर कोहरा दाबि दिहेसि।
खेत खाइगै सांड औ बछरू
उक्खुड़ि खेत ओइरान किहेसि।।
गोडे कई ठंडक कहै जनों
बिस्तर की बिजली गुल्ल हुई।
अब देख प्रकृति का ये तांडव
सब प्रगति हमारी लुल्ल हुई।।
– डॉ.उदयराज मिश्र




