साहित्य

दास्ताने इश्क़

डॉ.दक्षा

नज़रों से जो लिखी गई,

वो दास्ताने-इश्क़ है,

धड़कन में जो दबी रही,

वो दास्ताने-इश्क़ है।

 

तुम्हारी बाँहों में कट जाए

ये जिंदगी,

जो रात भर न सो सके,

वो दास्ताने-इश्क़ है।

 

हया के सुर्ख रंगों से रंगी है

ये मेरी मुहब्बत,

बिना कहे जो कह जाए,

वो दास्ताने-इश्क़ है।

 

कभी लबों की थरथराहट,

कभी आँखों की नमी,

सुकून बन के जो मिले,

वो दास्ताने-इश्क़ है।

 

न कोई कै़द है इसमें,

न ही कोई दीवार है,

रूह में जो उतर गई,

वो दास्ताने-इश्क़ है।

 

तमाम उम्र जिसे हम

सुनाते रहे ज़माने को,

मग़र जो अब भी है अनकही,

वो दास्ताने-इश्क़ है।

 

-डॉ.दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद,गुजरात।

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