
नज़रों से जो लिखी गई,
वो दास्ताने-इश्क़ है,
धड़कन में जो दबी रही,
वो दास्ताने-इश्क़ है।
तुम्हारी बाँहों में कट जाए
ये जिंदगी,
जो रात भर न सो सके,
वो दास्ताने-इश्क़ है।
हया के सुर्ख रंगों से रंगी है
ये मेरी मुहब्बत,
बिना कहे जो कह जाए,
वो दास्ताने-इश्क़ है।
कभी लबों की थरथराहट,
कभी आँखों की नमी,
सुकून बन के जो मिले,
वो दास्ताने-इश्क़ है।
न कोई कै़द है इसमें,
न ही कोई दीवार है,
रूह में जो उतर गई,
वो दास्ताने-इश्क़ है।
तमाम उम्र जिसे हम
सुनाते रहे ज़माने को,
मग़र जो अब भी है अनकही,
वो दास्ताने-इश्क़ है।
-डॉ.दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद,गुजरात।




