साहित्य

सीता को वनवास क्यों?

डाॅ सुमन

जनकपुरी की वाटिका में, सखियों संग मुस्काई।

तोता-तोती देख सिया भी, मन ही मन ललचाई॥

 

उड़कर दूर गया था तोता, तोती रही अकेली।

गर्भवती थी, उड़ न सकी वह, किस्मत हुई झमेली॥

 

पिंजरे भीतर बंद किया जब, रोई बारंबारा।

तोता बोला छोड़ो प्रिये को, सुन लो करुण पुकारा॥

 

दया न आई सिया हृदय में, बढ़ता गया विरह था।

तोती बिन तड़प-तड़प तोता, त्याग गया फिर देह था॥

 

तोती बोली शाप हमारा, व्यर्थ कभी न जाएगा।

गर्भवती हो तुम भी वन में, दुःख का फल फिर पाओगी॥

 

कालचक्र ने ली करवट फिर, सत्य हुआ वह वचन।

धोबी बनकर वही तोता था, बोला कठोर बचन॥

 

लोकलाज की वेदी पर फिर, सिया गई वनवासी।

निर्दोषी होकर भी सहती, पीड़ा रही उदासी॥

 

कर्म सदा प्रतिफल देते हैं, यही जगत का लेखा।

करुणा, दया, क्षमा से बढ़कर, नहीं दूसरा देखा॥

 

स्वरचित

डाॅ सुमन मेहरोत्रा’ सुरभि’

मुजफ्फरपुर, बिहार

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