
बनावटी चेहरे लेकर,
जाने कैसे जीते हैं लोग?
ऊपर से मुस्कुराते हैं,
भीतर पालते नफरत का रोग।
आजकल के रिश्तों ने जैसे,
स्वार्थ का लिबास ओढ़ लिया है।
बेगानों से निभाते रिश्ता,
अपनों से मुंह मोड़ लिया है।
मुंह में चाशनी दिल में विष,
लेकर घूमते हैं लोग यहां।
बनावटी चेहरे में फंस जाते हैं,
अपने धोखा देते हैं जाए कहां?
आज हर रिश्ता नकाब ओढ़ कर,
अपना अभिनय दिखाता है।
अपनों के विश्वास को मसलकर,
अपनेपन का ढोंग रचाता है।
बनावटी चेहरे मत बनाओ तुम,
जैसे भीतर वैसे ही बाहर रहो।
क्षणिक दिखावे से क्या मिल जाएगा?
समय के दर्पण में खुद को परखते रहो।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।




