
पवित्र श्रावण के पावन मास में अवसर रुद्राभिषेक करने कराने वाले भक्तों एवं कर्मकाण्डी ब्राह्मणों से करबद्ध विशेष निवेदन है कि पार्थिव (मिट्टी) के शिवलिंग का निर्माण शास्त्र सम्मत ही करें।
आकर्षक शिवलिंग बनाकर पेंट द्वारा लीपा पोती फोटोशूट करने और यजमान को प्रभावित करने के लिये शिवलिंग के मूलस्वरूप को विखण्डित न करें।
शिवलिंग को शिवलिंग ही रहने दें नाक,कान,मूंछ,दाढ़ी बनाने की और चित्रकारी की आवश्यकता नहीं है।
सनातन की सभी पूजा पद्धति विज्ञानमय है विधि एवं शास्त्र सम्मत पूजा करने से उसका प्रभाव हमारे जीवन में देखने को मिलता है जिसमें कोई भी संदेह नहीं है।
शास्त्रों में वर्णित विधि से ही शिवलिंग का निर्माण करें एवं चंदन रोली अक्षत भस्म पुष्प बिल्वपत्र आदि से ही भगवान का दिव्य श्रृंगार करें।
पंडित जी यजमान को प्रसन्न करने के लिए और यजमान संबंधियों को फोटो भेजने के लिए शिवलिंग के मूल स्वरूप
को विकृत न करें।
हमारी संस्कृति को विकृत करने के लिए विधर्मियों का समूह स्वयं प्रयासरत है।हमें हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप ही गतिविधियां करनी चाहिए सामायिक सुधार होते रहेंगे परन्तु संस्कृति के मूल स्वरूप में परिवर्तन स्वीकार नहीं अत: समस्त सनातन समाज को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।
विशेषकर सभी कर्मकाण्डी ब्राह्मण उक्त विषय पर विशेष ध्यान दें।निश्चित रूप से सभी विधि निषेध मानने वाले धर्मानुरागी लोग ध्यान देंगे ऐसी अपेक्षा है।
विधि ही सफलता का मूल है अतः पार्थिवेश्वर शिवलिंग निर्माण की शास्त्रीय मर्यादा का पालन करना अतिआवश्यक है।
।। सबका मंगल हो।।
आचार्य धीरज द्विवेदी “याज्ञिक”




