साहित्य

नाच न जाने आँगन टेढ़ा

संगीता वर्मा


जब न आए नाच-गाना,

तब दोष आँगन पर डालना।

काम खुद को हो न करना,

और बहाना रोज़ बनाना।

 

बुद्धि का हो जो दिवाला,

दोष देता वह तकदीर को।

गलती अपनी न माने कोई,

रस्ता पकड़े वह तीर को।

 

आलसी की यही निशानी,

दूसरों की मती बिगाड़ना।

हक न हो जब लड़ने का भी,

बिना बात ही ज़िद करना।

 

हुनर न हो तो मान ले तू,

यही है सच्ची सीख भइया।

झूठे दोष न मढ़ किसी पर,

छोड़ दे यह झूठी दुनिया।

 

स्वरचित और मौलिक

संगीता वर्मा

कानपुर उत्तर प्रदेश

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