
साधा हमने कर्म लक्ष्य तो, श्रम और संघर्ष करना है।
पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है ।।
जीवन की भट्टी में नित ही ,सूरज जैसे नर को तपना ।
लापरवाही हमने की तो,होगा अब पूर्ण नहीं सपना ।।
हमको आलस के दलदल से , तब बाहर मित्र निकलना है।
पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।।
सीमा पर सैनिक को देखो,मौसम की मारों को सहता।
करता प्राण त्याग माँ हित में,निर्भय हो जय वंदे कहता।।
आँधी -लू मग पर सहकर ही , हम सब को आगे बढ़ना है।
पथरीले कंटक पथ साथी,तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।।
नदिया भी लक्ष्य लिये चलती,जाकर सागर में मिल जाती ।
सारी बाधाओं को सहती, फिर भी गीत मिलन के गाती।।
दृग से धार खुशी की फूटे , खुद उत्सर्ग हमें करना है।
पथरीले कंटक पथ साथी, तो हॅंसते-हॅंसते चलना है।
डॉ मंजु गुप्ता
वाशी , नवी मुंबई।




