
जिसदिन तन रोगी हुआ,चित्त हुआ बेहाल।
दबी जुबां सब बोलते ,बुरी हमारी चाल।।
बुरी हमारी चाल ,हाल कोऊ नहिं पूछै।
पगपग भै दुश्वार,राह एकौ नहिं सूझै।।
कहत उदय करिसोच,कटै दिन तारे गिनगिन।
कोउ न दीहैं साथ,होय तन जर्जर जिसदिन।।
चकाचौंध की कौंध में,सच पर परदा डाल।
मय माया की कोठरी,दिखती मालामाल।।
दिखती मालामाल,असत सत को दुत्कारे।
कतहुँ न कान्हा दीख,कौन पुनि रावन मारे।।
उदय कहत सकुचाय,असत की फलती पौध।
तबहुँ नहीं उजियार,डसे आपुहि चकाचौध।।
पूत सयाने जब हुये,पश्चिम किये दुआर।
पूरब की ठंडी पवन, लगती उनको भार।।
लगती उनको भार,वसन बिनु सोहैं कैसे।
गणिका ज्यों इतराय,पाय धन जैसे तैसे।।
कहत उदय पछिताय,चटकाकर तोड़ें सूत।
चुप्पी साधे तात, इतराते मनबढ़ पूत।।
– डॉ.उदयराज मिश्र
शिक्षाविद एवम शैक्षिक सलाहकार




