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ब्राह्मण जाति नहीं सनातन धर्म एवं संस्कृति का मूल तथा संसार की आवश्यकता और जिम्मेदारी है।

आचार्य धीरज याज्ञिक

ब्राह्मण जाति नहीं सनातन धर्म एवं संस्कृति का मूल तथा संसार की आवश्यकता और जिम्मेदारी है।”
“जब ब्राह्मण अपनी भूमिका,अपना महत्व भूल जाए तब वहाँ धर्म गूंगा,न्याय अंधा और शक्ति विक्षिप्त हो जाती है”
प्रश्न उठता है कि ब्राह्मण कौन है ?
क्या ब्राह्मण जो मात्र यज्ञ करता है ?
या वह जो मात्र जनेऊ पहनता है,चन्दन लगाता है ?
उत्तर है नहीं!
ब्राह्मण वह है जो समाज की आत्मा में ज्ञान का दीप जलाता है।
वह जो अपने भीतर के अंधकार को पहले मिटाता है जिससे की पूरी दुनियाॅं प्रकाश देख सके।
वेद भगवान कहते हैं –
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः,पद्भ्यां ॅं शूद्रो अजायत॥
(यजुर्वेद-पुरुषसूक्त)
अर्थात् भगवान विराट पुरुष के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ।
मुख जो बोलता है,जो मार्ग दिखाता है।ब्राह्मण समाज का दृष्टा है चिन्तक है,मार्गदर्शक है।
परन्तु आज ब्राह्मण को स्वयं नहीं पता कि उसका अर्थ क्या है।
ब्राह्मण मात्र कुर्सियों की राजनीति में खो गया,डिग्रियों में उलझ गया और आत्मज्ञान की साधना भूल बैठा।
“न द्विजः कर्मणा ब्राह्मणः ज्ञानत एव ब्राह्मणः।”
(मनुस्मृति)
ब्राह्मण जन्म से नहीं,कर्म और ज्ञान से होता है।
वह जो लोभ पर विजय प्राप्त कर लिया हो,वह जो सत्य को जीवन बना लिया हो,वही सच्चा ब्राह्मण है।
ब्राह्मण वह है –
जो राजा को धर्म सिखाता है,सेना को विवेक सिखाता है,जनता को संयम सिखाता है और स्वयं को मौन में साधता है।
ब्राह्मण के गुण श्री गीता जी में –
“शमः दमः तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्॥”
(भगवद्गीता 18-42)
शांति,इन्द्रियों का संयम,तपस्या,पवित्रता,क्षमा,सरलता, ज्ञान,विज्ञान और श्रद्धा।
यह कोई विशेषाधिकार नहीं यह दायित्व है।
ब्राह्मण का कर्तव्य है-
जहाँ असत्य हो,वहाँ शब्द बने।
जहाँ अंधकार हो,वहाँ दीप बने।
जहाँ अधर्म हो,वहाँ ज्वाला बने।
“न ब्राह्मणोऽभ्यसूयेत् ब्राह्मणो हि देवता: पृथिव्याः।”
(शतपथ ब्राह्मण 1.1.2.6)
ब्राह्मण को तुच्छ मत समझो वह समाज की आत्मा है।
अतः हे ब्राह्मणों!
जागो- अपने निज सत्य स्वरूप को पहचानो।
जागो- मात्र ग्रन्थ ही मत पढ़ो जीवन को वेद बनाओ।
तुम्हारा मौन तप है,तुम्हारा वाणी वेद है और तुम्हारा आचरण ही आदर्श है।
ब्राह्मण होना गर्व के साथ तप है।
और इस तप का परिणाम है विश्व का कल्याण हो।
।। आचार्य धीरज “याज्ञिक” ।।
श्री बज्रांग आश्रम देवली प्रतापपुर (फूलपुर) प्रयागराज।

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