
मध्यकालीन भारतीय साहित्य में गोस्वामी तुलसीदास केवल एक महान कवि ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्निर्माण के अग्रदूत भी हैं। जिस काल में संस्कृत का सामाजिक प्रयोग सीमित हो चुका था और लोकभाषाएँ जनमानस की संवाहक बन रही थीं, उस काल में तुलसीदास द्वारा अवधी में श्रीरामचरितमानस की रचना एक ऐतिहासिक और वैचारिक निर्णय के रूप में सामने आती है। यह मान्यता ऐतिहासिक रूप से सिद्ध है कि तुलसीदास संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे।उनकी रचनाओं में वेद, उपनिषद, पुराण और स्मृतियों के गूढ़ संकेत संस्कृतनिष्ठ छन्द, अलंकार और दार्शनिक पदावली
वाल्मीकि रामायण, अध्यात्म रामायण और पुराणों का सूक्ष्म समन्वय स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। विनयपत्रिका, हनुमानबाहुक, कवितावली और गीतावली जैसी रचनाएँ उनके संस्कृत पाण्डित्य का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। अतः यह निष्कर्ष निर्विवाद है कि अवधी में मानस की रचना किसी भाषिक असमर्थता का परिणाम नहीं थी। तुलसीदास का काल वह समय है जब बौद्ध धर्म और बाद में भक्ति आन्दोलन के प्रभाव से लोकभाषाओं का प्रसार हो चुका था
विदेशी आक्रमणों से संस्कृत शिक्षा-केन्द्र, मठ और आश्रम नष्ट हो चुके थे शासन और प्रशासन की भाषा फारसी बन चुकी थी संस्कृत जनसामान्य से कटकर मुख्यतः कर्मकाण्ड और सीमित विद्वत् समाज की भाषा रह गई थी। ऐसे समय में संस्कृत में रचित ग्रंथ व्यापक सामाजिक प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकते थे। तुलसीदास का उद्देश्य केवल काव्य-रचना नहीं, बल्कि लोकमंगल था। वे राम को राजदरबार के नायक के रूप में नहीं, बल्कि समाज के नैतिक आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे।
इसके लिए ऐसी भाषा आवश्यक थी जो जनसामान्य की संवेदना से जुड़ी हो जो स्त्री, शूद्र, किसान और श्रमिक तक पहुँच सके जो कथा, कीर्तन और रामलीला के माध्यम से जीवंत हो सके अवधी इस उद्देश्य के लिए सर्वाधिक उपयुक्त थी। अवधी में रामचरितमानस की रचना ने रामकथा को गाँव-गाँव तक पहुँचाया
मंदिर से बाहर निकालकर चौपाल तक ले आई संस्कृत-शास्त्र के दार्शनिक तत्त्वों को सरल भावात्मक रूप प्रदान किया यह ग्रंथ केवल पढ़ा नहीं गया, बल्कि गाया गया, जिया गया और लोकसंस्कृति का अभिन्न अंग बन गया। यह महत्वपूर्ण तथ्य है कि तुलसीदास ने संस्कृत परम्परा का परित्याग नहीं किया, बल्कि उसे लोकभाषा में रूपान्तरित किया।
रामचरितमानस में वेदांत का तत्वज्ञान भक्ति और कर्म का समन्वय,मर्यादा, करुणा और धर्म का शास्त्रीय विवेचन लोकभाषा में इस प्रकार प्रस्तुत है कि संस्कृत की आत्मा अक्षुण्ण बनी रहती है। तुलसीदास को संस्कृत और लोकभाषा के बीच सेतु-कवि कहा जा सकता है। वे एक ओर संस्कृत की शास्त्रीय परम्परा से गहराई से जुड़े हैं, तो दूसरी ओर लोकजीवन की धड़कन को भी पहचानते हैं।
उनकी यह भूमिका भारतीय साहित्य के इतिहास में अद्वितीय है तुलसीदास द्वारा अवधी में श्रीरामचरितमानस की रचना ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक उत्तरदायित्व और भक्ति-दृष्टि का समन्वित परिणाम है।
विदेशी आक्रमणों और बौद्ध-भक्ति परम्परा से उत्पन्न भाषिक परिवर्तनों के बीच तुलसीदास ने संस्कृत की वैचारिक परम्परा को लोकभाषा में सुरक्षित और जीवंत रखा।
इस प्रकार वे न केवल महान कवि हैं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक निरन्तरता के सबसे सशक्त संवाहक भी हैं।
लेखक दि ग्राम टुडे प्रकाशन समूह के संस्थापक और समूह सम्पादक हैं।



