साहित्य

भोर की प्रतीक्षा

अशोक आनन

रैन को है –
भोर की प्रतीक्षा ।

शशि भी –
निकला नहीं मेघों से ।
तारे भी –
त्रस्त हैं स्याह ठगों से ।

नैन को है –
भोर की प्रतीक्षा ।

पंछी भी –
दुबके हैं नीड़ में ।
उजाला खो गया –
तम – भीड़ में ।

कली को है –
भोर की प्रतीक्षा ।

गाॅंव के घर –
पसरा सन्नाटा ।
शहरों का –
वही सैर – सपाटा ।

चैन को है –
भोर की प्रतीक्षा ।

पेटों में –
भूख़ थककर सोई ।
प्यास की मारी –
नदियाॅं रोईं ।

पंछी को है –
भोर की प्रतीक्षा ।

Email – ashokananmaksi@gmail.com

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