
रैन को है –
भोर की प्रतीक्षा ।
शशि भी –
निकला नहीं मेघों से ।
तारे भी –
त्रस्त हैं स्याह ठगों से ।
नैन को है –
भोर की प्रतीक्षा ।
पंछी भी –
दुबके हैं नीड़ में ।
उजाला खो गया –
तम – भीड़ में ।
कली को है –
भोर की प्रतीक्षा ।
गाॅंव के घर –
पसरा सन्नाटा ।
शहरों का –
वही सैर – सपाटा ।
चैन को है –
भोर की प्रतीक्षा ।
पेटों में –
भूख़ थककर सोई ।
प्यास की मारी –
नदियाॅं रोईं ।
पंछी को है –
भोर की प्रतीक्षा ।
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