
लौह थे आप,
पर कठोर नहीं—
आपकी दृढ़ता में
करुणा की नमी थी।
टूटते भारत को
आपने
एक नाम दिया—
एकता।
जहाँ रियासतें थीं
वहाँ विश्वास बोया,
जहाँ संदेह था
वहाँ संकल्प खड़ा किया।
न कोई शोर,
न कोई अलंकार—
बस राष्ट्र के हित में
अडिग निर्णय।
इतिहास ने आपको
तलवार नहीं दी,
आपने इतिहास को
रीढ़ दी।
आज आपकी पुण्यतिथि पर
देश
नमन करता है
उस मौन पुरुष को
जिसकी दृढ़ता में
भारत सुरक्षित रहा।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार




