आलेख

प्रेम जब प्रतीक्षा को देता है, तो संस्कार बनता है

दया भट्ट दया

आधुनिक समय में प्रेम और विवाह को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि सब कुछ पहले जान लेना ही परिपक्वता है। जबकि मनोविज्ञान और सामाजिक अनुभव—दोनों बताते हैं कि हर अनुभव का समय से पहले समाप्त हो जाना, उसे गहरा नहीं बल्कि सतही बना देता है।भारतीय समाज में विवाह केवल दो व्यक्तियों का साथ रहना नहीं रहा है, बल्कि वह एक संस्कार रहा है—जिसका आधार प्रेम के साथ-साथ प्रतीक्षा, धैर्य और अनजानपन का सौंदर्य रहा है।पुरानी पीढ़ी के दांपत्य में जानकारी कम थी, पर ठहराव अधिक।नई पीढ़ी के पास जानकारी बहुत है, पर ठहराव कम होता जा रहा है।यह अंतर केवल नैतिक नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है।पुरानी पीढ़ी की स्त्री और पुरुष विवाह में प्रवेश करते समय एक-दूसरे को पूरी तरह नहीं जानते थे, पर वे एक-दूसरे को समझने के लिए समय देने को तैयार थे। यही समय, यही प्रतीक्षा—धीरे-धीरे प्रेम को संस्कार में बदलती थी। पहला स्पर्श अनुभव बनता था, पहली रात स्मृति बनती थी, और संबंध धीरे-धीरे जड़ पकड़ता था।आज की पीढ़ी अधिक स्वतंत्र है, अधिक सचेत है—यह उपलब्धि है।लेकिन इसी स्वतंत्रता की जल्दबाज़ी में हमने यह मान लिया है कि प्रतीक्षा अनावश्यक है।दांपत्य-मनोविज्ञान कहता है कि जब हर प्रश्न का उत्तर पहले ही मिल जाए, तो विवाह खोज नहीं रह जाता—वह केवल पुष्टि बनकर रह जाता है।स्त्री की दृष्टि से देखें, तो फर्क और स्पष्ट होता है।पहले स्त्री प्रतीक्षा करती थी, क्योंकि समाज उसे सीमित करता था।आज की स्त्री प्रतीक्षा नहीं करना चाहती, क्योंकि समाज उसे विकल्प देता है।लेकिन दोनों ही स्थितियों में, यदि प्रतीक्षा स्वेच्छा से नहीं है, तो वह संबंध को गहराई नहीं देती।प्रेम जब प्रतीक्षा को देता है, तभी वह संस्कार बनता है।और जब प्रतीक्षा नहीं होती, तो प्रेम अनुभव तो बन सकता है—पर संस्कार नहीं।आज विवाह से पहले सब कुछ “परख” लेने की प्रवृत्ति को आधुनिकता कहा जाता है। लेकिन प्रश्न यह है—क्या परख लेने से आश्चर्य समाप्त नहीं हो जाता?क्या संबंध तब भी उतना ही जीवंत रहता है, जब उसमें कुछ अनजाना शेष न रहे?यह लेख आधुनिकता का विरोध नहीं करता।यह केवल उस अति-तेज़ी पर प्रश्न उठाता है, जो हर अनुभव को समय से पहले खत्म कर देती है।संस्कृति का अर्थ नियंत्रण नहीं, धीरज है।और धीरज के बिना कोई भी संबंध—चाहे वह कितना ही सचेत क्यों न हो—थकाऊ हो जाता है।हमें न तो पुरानी पीढ़ी के मौन में लौटना है, न नई पीढ़ी की जल्दबाज़ी में डूबना है।हमें दोनों के बीच वह संतुलन खोजना है, जहाँ प्रेम पहले समझ बने और विवाह फिर संस्कार।

क्योंकि जो प्रेम ठहरना जानता है,
वही जीवन भर साथ चल पाता है,

दया भट्ट दया
खटीमा, उधम सिंह नगर, उत्तराखंड

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