
सहानुभूति बटोरना आदत नहीं मेरी,
मैं हालातों से लड़ने की हिम्मत रखती हूँ।
हर मोड़ पर खुद को साबित किया है मैंने,
मैं परिस्थिति के संग चलने की ताक़त रखती हूँ।
न शिकवा किसी से, न कोई गिला,है
मैंने हर दर्द को मुस्कान से पिरोया है
जो टूटे, उसे जोड़ना भी आता है मुझे,
मैंने खुद को हर बार नया संजोया है ।
मेरी चुप्पी को कमज़ोरी मत समझना,
ये खामोशी भी आग बन जाती है ज़रूरत पर।
मैं झुकती नहीं, बस समझौता कर लेती हूँ,
क्योंकि रिश्तों की अहमियत जानती हूँ
ना भीड़ में दिखावा, ना मंचों की चाह,
मुझे खुद से ही मिलने में आता है राहत का एहसास
जो देख न सके मेरी आंखों का आत्मबल,
उसे क्या समझ आएगा मेरे संघर्षों का इतिहास।
मैं कमजोर नहीं, बस सहज हूँ,
हर तूफान को अपने भीतर सहेजने में निपुण हुँ
मेरे अंदर की शांति को न परखो ऊपरी शोर से,
मैं ज्वाला भी हूँ, और शीतल नदिया सी भी पूर्ण हुँ।
पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर ✍️




