साहित्य

हाय रे दुविधा! (सिर्फ एक पीस)

ज्योति कुमारी

मैं ज्योति कुमारी, आज आपके लिए लेकर आई हूँ हर महिला के दिल की वो ‘खूबसूरत दुविधा’, जो एक साड़ी की दुकान से शुरू होती है…
दुकान वाले भैया पूछते हैं—
“बहन जी! कौन सी साड़ी दिखाऊं?”
मेरा जवाब होता है— “बस एक पीस निकालिए,
खुद को आज रानी जैसा महसूस करना है!”
डब्बा खुला…
तो लाल साड़ी ने जैसे आँख मार कर कहा—
“कहो, आज किसका दिल धड़काना है क्या?”
थोड़ी देर बाद काली साड़ी क़ातिल मुस्कान लेकर आई,
जैसे पूछ रही हो— “क्या सच में ले लूँ तुम्हारी जान?”
पीली साड़ी भी नाज़-नखरे दिखाती हुई बोली—
“मैं तो हल्दी की धुन सुना रही हूँ,
मुझे भला कौन मना कर पाएगा?”
आसमानी कॉटन की साड़ी ने ठंडी हवा की तरह छुआ,
लगा गर्मी के दिनों में यही तो सुकून देगी!
पर फिर याद आया— मैं तो पार्टी के लिए आई हूँ,
पिया जी से बोल कर!
दिल बोला— अरे! रोज़मर्रा की ज़िंदगी में भी तो
खूबसूरत दिखना है ना?
तभी डब्बा बदला… यह तो पटोला है,
जिसकी धुन ही निराली है!
कहीं जॉर्जेट, कहीं लहरिया…
हर साड़ी एक नया रंग, एक नई कहानी लाती है।
हाथ में रुमाल, माथे पर पसीना, मन परदेसी…
कौन सी चुनूँ और कौन सी छोड़ूँ?
बहुत देर बाद थक कर मैंने कहा—
“भैया! ठीक है, एक ही पीस चाहिए थी,
पर आज कुछ समझ नहीं आया!”
जब दुकान से बाहर निकली, तो खुद पर ही हँसी आई,
हाय रे दुविधा!
उस एक पीस के चक्कर में…
मैं साड़ियों की पूरी ‘बारात’ छोड़ आई!

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