
पीठ से उतार दो
अतीत की गठरी,
क्यों हर मोड़ पर
बोझ उठाए फिरते हो।
जो बीत गया, उसे
बीत जाने दो,
क्यों हर पल बीते
कल में जीते हो।
कुछ यादें थीं जो
सबक बन गईं,
कुछ रिश्ते थे जो
अधूरे रह गए।
हर टूटन ने कुछ
सिखाया मगर,
ज़ख़्मों को उम्र भर
क्यों सहलाते रहे।
आज की धूप को
महसूस तो करो,
कल की छाया में
क्यों उलझे हो।
जो हाथ छूटे, उन्हें
माफ़ करो,
नए सपनों से क्यों
कतराते हो।
हल्के क़दमों से आगे
बढ़ चलो,
ज़िंदगी बोझ नहीं,
एक यात्रा है।
पीठ से उतार दो
अतीत की गठरी,
यही वर्तमान की सबसे बड़ी साधना है।
पूनम त्रिपाठी
गोरखपुर ✍️




