हिंदी साहित्य का इतिहास (भक्ति काल की प्रमुख शाखाएँ-प्रवृत्तियाँ व कवि) विषयक ऑनलाइन संगोष्ठी सम्पन्न

वागीश्वरी काव्य निर्झरिणी, प्रयागराज (उ.प्र.) के तत्वावधान में दिनांक 20 दिसंबर 2025 को 12वीं राष्ट्रीय आभासी संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। गोष्ठी का विषय “हिंदी साहित्य का इतिहास (भक्तिकाल की सभी शाखाएँ – प्रवृत्तियाँ एवं कवि)” था। निर्धारित समयानुसार सायं 8.15 बजे प्रारम्भ होकर रात्रि 10 बजे तक यह गोष्ठी अत्यंत गरिमामयी तथा सुव्यवस्थित स्वरूप में चलती रही।

इस साहित्यिक मंच के संस्थापक तथा अध्यक्ष डॉ.अर्जुन गुप्ता गुंजन ने कार्यक्रम की रुपरेखा प्रस्तुत करते हुए आज के विषय पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम के प्रारम्भ में आ. पूजा काशीनाथ मुठ्ठे ने माँ शारदे का आह्वान करते हुए सरस्वती वंदना प्रस्तुत किया। तत्पश्चात वरिष्ठ संरक्षक आ. विनीता निर्झर ने अपने स्वागत उद्बोधन में इस ऑनलाइन संगोष्ठी में उपस्थित समस्त वक्ताओं, संचालक, समीक्षक, आभार ज्ञापनकर्ता तथा प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से उपस्थित सभी श्रोताओं का स्वागत किया। इसके बाद आ. सुनीता मिश्रा के कुशल सञ्चालन में संगोष्ठी प्रारम्भ हुई। उन्होंने सुन्दर काव्यात्मक पंक्तियों के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को जीवंत, रोचक तथा गतिशील बनाए रखा। उन्होंने सबसे पहले प्रथम वक्ता के रूप में आ. सोनाली अवसरमोल को आमंत्रित किया। आ. सोनाली जी ने भक्ति काल के ज्ञानमार्गी शाखा पर सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया। आपने ज्ञानमार्गी शाखा का महत्व, उसकी प्रमुख प्रवृत्तियाँ तथा निर्गुण भक्ति में ज्ञान की भूमिका को आपने तथ्यपरक ढंग से प्रस्तुत किया तथा कबीरदास इत्यादि संत कवियों की रचनाओं का उल्लेख किया। इसके बाद द्वितीय वक्ता आ. रुचि अग्रवाल ने कृष्णमार्गी शाखा पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया। आपने इस काल-खंड के साहित्य पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कृष्णा भक्ति शाखा के विविध भावों की सुंदर व्याख्या की। तत्पश्चात तृतीय वक्ता आ. बबीता शुक्ला ने राममार्गी शाखा पर प्रकाश डालते हुए रामचरितमानस की महत्ता, सामाजिक कल्याण, मर्यादा, करुणा और संवेदना जैसे मूल्यों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। इसके बाद चतुर्थ वक्ता के रूप में आ. सुनीता मिश्रा ने निर्गुण भक्तिधारा की प्रेममार्गी शाखा पर सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत किया। इसके पश्चात डॉ. अर्जुन गुप्ता गुंजन ने भक्तिकाल की सभी प्रमुख शाखाओं पर विश्लेषणात्मक समीक्षा प्रस्तुत किया। उन्होंने भक्ति काल को हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहे जाने का कारण स्पष्ट करते हुए बताया कि भक्ति काल, जिसकी अवधि विक्रम सम्वत 1375 से 1700 है, के साहित्य में भाव-भक्ति तथा काव्य-कला का अनूठा संगम मिलता है। उन्होंने बताया कि इस काल के कवि दरबारी-कवि नहीं थे। कबीरदास जुलाहा के रूप में कपडा बुन कर, रविदास चमड़े का जूता बना कर अपना भरण-पोषण करते थे। गोस्वामी तुलसीदास कथावाचक का कार्य करते थे। उन्होंने सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय प्रधान रचना का सृजन किया। दर्शक दीर्घा में उपस्थित अनेक साहित्य मनीषियों में से आ.नयना गाविल, अंजू अवस्थी तथा रामकिशोर पाठक ने अपने विचार प्रकट किये तथा इस कार्यक्रम की भूरी-भूरी प्रशंसा की। आ.नयना जी ने सराहना करते हुए बताया कि इस तरह के आयोजन हिंदी साहित्य को जानने का अवसर देते हैं और जागरुकता बढ़ाते हैं। कार्यक्रम के अंत में आ. सोनाली अवसरमोल ने सरस्वती वंदना के लिए पूजा काशीनाथ मुठ्ठे तथा स्वागतकर्ता के लिए विनीता निर्झर का आभार प्रकट किया। आपने वक्ताओं, श्रोताओं, संचालक तथा समीक्षक को धन्यवाद ज्ञापित किया। अंत में संस्थापक अध्यक्ष डॉ. अर्जुन गुप्ता गुंजन ने गोष्ठी के समापन की घोषणा की।


