उत्तर प्रदेश आजीविका मिशन में इनरोल डीआरपी, नया साल और गहराती आजीविका की चिंता
जमीनी हकीकत पर आधारित विस्तृत रिपोर्ट

के आर सिंह अधिवक्ता
नया साल सामान्यतः नई उम्मीदों, अवसरों और सकारात्मक बदलाव का संदेश लेकर आता है, लेकिन उत्तर प्रदेश आजीविका मिशन (UPSRLM) में इनरोल किए गए डीआरपी (District Resource Person ) के लिए यह नया साल भी पुराने संकट, अनिश्चितता और उपेक्षा के साथ शुरू हुआ है। जिन हाथों में ग्रामीण आजीविका को सशक्त करने की जिम्मेदारी दी गई, वही हाथ आज खुद रोज़गार की तलाश में हैं।
चयन हुआ, प्रशिक्षण मिला—पर काम नहीं
उत्तर प्रदेश के 75 जनपदों में सैकड़ों प्रशिक्षित डीआरपी वर्षों से आजीविका मिशन से जुड़े हैं। इन्हें स्वयं सहायता समूह (SHG), ग्रामीण आजीविका, सामाजिक सशक्तिकरण, वित्तीय समावेशन और कौशल विकास जैसे विषयों पर विशेष प्रशिक्षण दिया गया। इसके बावजूद स्थिति यह है कि—
डीआरपी इनरोल हैं,
उन्हें प्रशिक्षण और अनुभव प्राप्त है,
लेकिन उन्हें नियमित या पर्याप्त काम नहीं दिया जा रहा।
कई जनपदों में महीनों से डीआरपी को कोई स्पष्ट असाइनमेंट नहीं मिला है, जिससे उनकी आजीविका पर सीधा संकट खड़ा हो गया है।
न प्रमोशन, न पहचान, न भविष्य
स्थिति को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि उत्तर प्रदेश आजीविका मिशन—
अपने चयनित डीआरपी को अन्य सरकारी विभागों में समावेश या प्रमोशन नहीं देता,
वैध परिचय पत्र (ID Card) तक जारी नहीं करता,
जिससे डीआरपी की पहचान, सम्मान और कार्यक्षमता तीनों प्रभावित होती हैं।
फील्ड में कार्य के दौरान डीआरपी न तो अपनी भूमिका प्रभावी ढंग से निभा पाते हैं और न ही प्रशासनिक तंत्र में उनकी बात को गंभीरता से लिया जाता है।
प्राथमिकता मानव संसाधन नहीं, सिर्फ काग़ज़
डीआरपी का आरोप है कि मिशन स्तर पर मानव संसाधन और जमीनी कार्यकर्ताओं की चिंता के बजाय, फाइल, बिल, भुगतान और कागजी औपचारिकताओं पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है। सवाल यह नहीं रह गया कि—
“डीआरपी कैसे जिएंगे?”
बल्कि यह बन गया है—
“बिल और कागज कैसे पूरे होंगे?”
यह दृष्टिकोण न केवल संवेदनहीन है, बल्कि आजीविका मिशन के मूल उद्देश्य—गरीबों और ग्रामीणों की आजीविका सुनिश्चित करना—के भी विपरीत है।
75 जनपदों में प्रशिक्षित रिसोर्स पर्सन बेकार
यह समस्या किसी एक जिले तक सीमित नहीं है। पूरे प्रदेश के 75 जनपदों में सैकड़ों डीआरपी—
काम की प्रतीक्षा में हैं,
आर्थिक और मानसिक संकट से जूझ रहे हैं,
और धीरे-धीरे व्यवस्था से भरोसा खोते जा रहे हैं।
इतने बड़े प्रशिक्षित मानव संसाधन का उपयोग न होना, सरकारी धन और प्रशिक्षण व्यवस्था—दोनों की गंभीर बर्बादी है।
रोजगार गारंटी बनाम जमीनी सच्चाई
एक ओर सरकार रोजगार गारंटी योजना और ग्रामीण रोजगार की बात करती है, वहीं दूसरी ओर—
पहले से प्रशिक्षित,
अनुभवी,
और चयनित डीआरपी
को काम से वंचित रखा गया है।
यह विरोधाभास कई सवाल खड़े करता है—
जब डीआरपी जैसे प्रशिक्षित लोग बेरोज़गार हैं, तो रोजगार गारंटी का दावा कितना सार्थक है?
क्या विभागों के बीच समन्वय की कमी इसका कारण है?
या यह प्रशासनिक उदासीनता का परिणाम है?
बिहार बनाम उत्तर प्रदेश : एक स्पष्ट अंतर
जहां बिहार में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं ने सरकार बनाने तक में निर्णायक भूमिका निभाई, वहीं उत्तर प्रदेश में समूहों के नाम पर किए जा रहे कार्य संतोषजनक नहीं दिखाई देते। जब तक प्रशिक्षित रिसोर्स पर्सन को अन्य विभागों से समावेश (Convergence) नहीं दिया जाएगा, तब तक—
बाल श्रम रोकने की बात,
आजीविका सुदृढ़ीकरण,
और स्वास्थ्य सुरक्षा
के दावे केवल औपचारिकता और बेईमानी साबित होंगे।
उपेक्षा का शिकार प्रशिक्षित युवा
विडंबना यह है कि डीआरपी वे युवा हैं, जिन्होंने देश के कई सरकारी विभागों से प्रशिक्षण प्राप्त किया है, जिनका व्यक्तित्व, क्षमता और अनुभव आज भी प्रासंगिक है। इसके बावजूद वे आज उपेक्षा और असुरक्षा के शिकार हैं।
यदि उत्तर प्रदेश आजीविका मिशन वास्तव में गरीबों और ग्रामीणों की आजीविका को लेकर गंभीर है, तो उसे सबसे पहले अपने ही प्रशिक्षित डीआरपी की स्थिति पर ईमानदारी से विचार करना होगा। डीआरपी कोई अस्थायी बोझ नहीं, बल्कि मिशन की रीढ़ हैं।
नया साल तभी सार्थक होगा, जब इन सैकड़ों रिसोर्स पर्सन के लिए नियमित काम, पहचान, सम्मान और न्यूनतम आजीविका की सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी। अन्यथा, आजीविका मिशन अपने उद्देश्य से भटकता हुआ ही दिखाई देगा।



