“ननद–भौजाई (ठिठोली–संवाद)”
शीर्षक से ई रचना भोजपुरी लोकजीवन के ओह रंगीन, चटख और सजीव परंपरा के सजीव उदाहरण बा , जहाँ हँसी–ठिठोली, शंका–संकोच, मर्यादा–मस्ती एक साथ बहत नजर आवेले।
कवि चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा ‘अकिंचन’ जी एह कविता में ननद–भौजाई के पारंपरिक संवाद के माध्यम से ग्रामीण समाज के मनोविज्ञान, स्त्री-जीवन के दबाव आ लोक-संस्कृति के सहज व्यंग्य के बखूबी उकेरले बानी।
कविता के भाषा ठेठ, देसज आ रसपूर्ण बा।
“भसक गइल अंगिया”, “फाट गइल चुनरी”, “झरबेरिया भइल बैइरिन” जइसन पंक्तियाँ लोकबिंबन के मजबूत पकड़ देखावेलीं। हर पंक्ति में संवादात्मक लय बा, जवन कविता के नाटकीय प्रभाव देले बा।
ननद के चुटीला सवाल आ भौजाई के चतुर जवाब—दूनों में लोकलाज आ मस्ती के संतुलन खूब सुघर ढंग से निभावल गइल बा। कविता कहीं भी अश्लीलता में ना फिसल के, संकेत, ठिठोली आ व्यंग्य के सहारे बात कह देतिया—ई कवि के साहित्यिक परिपक्वता के प्रमाण ह।
“भइया गइलं देशावर” वाला प्रसंग कविता के भावनात्मक धरातल और गहिरा कर देत बा। इहाँ केवल हँसी ना, बल्कि स्त्री के सामाजिक स्थिति, अकेलापन आ लोक-नजर के डर भी बहुत सहज ढंग से उभर के आवता।
छंद, तुक आ प्रवाह—तीनों मजबूत बा। कविता पाठ में भी असरदार बा आ मंच पर त प्रस्तुति के पूरा सामर्थ्य रखेले। ई रचना बतावेला कि भोजपुरी कविता आजो लोक-संवेदना, संवाद आ शिष्ट हास्य के बल पर केतना सशक्त बा।
निष्कर्ष रूप में, ई कहल जा सकेला की ई कविता न केवल मनोरंजन करेले, बल्कि भोजपुरी लोक-संस्कृति के जीवंत दस्तावेज बन जाले।
अकिंचन जी के लिखाई लोक परम्परा के मिट्टी में रची-बसी, पर विचार में परिपक्व नजर आवेले।
भोजपुरी साहित्य खातिर ई एगो सराहनीय, पठनीय आ मंचीय दृष्टि से सफल रचना हवे।
हार्दिक बधाई कवि अकिंचन जी के। 🙏🌾




