आलेख

आधुनिक विकास के दो पहलू

डॉ. शीलक राम आचार्य

सफेद बाल भी कभी व्यापार का माध्यम बन सकते हैं? सुनने में विचित्र लगता है लेकिन यह सच है।सफेद बालों को संसार में खरबों रुपए का बिजनेस बना दिया गया है। चालाक लोग कहीं से भी धन- दौलत बना सकते हैं। यदि आपको वृहत् स्तर पर कोई भी काम करना है तो ‘भय’ को केंद्र में रखकर यह सब संभव हो सकता है। इस समय बालों को रंगने के लिये ‘हेयर डाई’ का दुनिया में खरबों रुपए प्रतिवर्ष का व्यापार है।यह ‘हेयर डाई’ का व्यापार वैसे ही नहीं बन गया है। इसके लिये लोगों को बुढा होने का भय और जवान दिखने का प्रलोभन दिखलाया गया है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने करोड़ों जवान से प्रोढ होते लोगों के सफेद होते बालों का भय दिखाकर उन्हें अधिक आयु तक जवान दिखने का प्रलोभन दे रखा है। यदि आप जवान दिखना चाहते हो तो अपने सिर के बालों को ‘हेयर डाई’ से काला कर लो।बस, सबको आपकी उम्र रुक जाने का अहसास हो जायेगा। खुद भी ऐसा लगने लगेगा कि अभी तो मैं जवान हूं। हकीकत यह है कि ऐसा करके हम अपने शरीर के भीतर हो रहे बदलाव को स्वीकार नहीं कर रहे हैं अपितु उस बदलाव से लड़ रहे हैं।खुद से खुद ही लड़ने से हमारी खुद की ही प्राण ऊर्जा नष्ट होती रहती है।जब जवानी भीतर से खत्म हो रही हो,तो बालों को रंगकर बाहरी बदलाव से कुछ नहीं होने वाला।हम दूसरों को धोखा दे सकते हैं तथा दूसरों से धोखा खा सकते हैं, लेकिन जवानी नहीं आयेगी। हमारी देह प्रकृति से अलग नहीं है।वह प्रकृति से ही बनी है। बदलाव प्रकृति का नियम है।उस बदलाव को स्वीकार करना चाहिये।इसी में हमारी भलाई है। लेकिन क्योंकि हम प्रचार और विज्ञापन से प्रभावित होते हैं और साथ में भय और प्रलोभन।इन सबके कारण हम एक षड्यंत्र में फंस जाते हैं। ‘हेयर डाई’ बनाने वाले तो मालामाल हो जाते हैं लेकिन हमारी सेहत का कबाड़ा तो होता ही है, इसके साथ हीनता की भावना भी घर कर लेती है।
मैं एक किसी सज्जन को सनातन भारतीय संस्कृति के जीवन -मूल्यों पर वक्तव्य को सुन रहा था। उन्होंने सनातन संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में ‘श्वेत केश’ के समस्त रहस्य को उजागर कर दिया है। किसी शारीरिक कमजोरी को छोड़कर एक आयु के पश्चात् ‘श्वेत केश’ शरीर के रसायनशास्त्र का एक गहन संकेत है। ‘श्वेत केश’ ज्ञान,मान, गहनता,गूढता और प्राण ऊर्जा के बाहर से भीतर की ओर लौटने का संकेत हैं।यह अपने मूल स्रोत, अपने मूल केंद्र, अपने मूल अस्तित्व की तरफ वापस लौट आने का निमंत्रण है।यह इस बात का सूचक है कि अपने खुद को जानने के लिये भी कुछ करो।यह मूल केंद्र शुभ्र श्वेत है।इस शुभ्र श्वेत रंग में सृष्टि के सभी रंग आकर एक हो जाते हैं।काला लाल पीला नीला हरा आदि सभी रंग शुभ्र श्वेत से ही जन्मे हैं। वहीं पर वापस लौट जाना है। सबको उसी निज केंद्र या अस्तित्व या होने में वापस जाना है। संसार का भोग करने का समय समाप्त हो गया है।अब खुद को जानकर परमभोग भी करो।यही संकेत है सफेद केश। लेकिन संसार में तो विचित्र- विचित्र घटनाएं हो रही हैं। यहां तो योगाचार्य,संत, कथाकार कहलवाने वाले लोग भी अपने सफेद बालों को छिपाकर काला दिखलाने की होड़ में लगे हुये हैं।जिनकी आयु पचास- पचास और साठ -साठ वर्षों की हो चुकी है तथा दाढी,मूंछ,सिर,छाती के पूरे बाल सफेद हो चुके हैं,वो तथाकथित बड़े लोग भी महंगी महंगी डाई से अपने बालों को काला करके खुद को जवान, हृष्ट-पुष्ट और कामुक देहयष्टि का दिखलाना चाहते हैं। और ऊपर से वो विश्व प्रसिद्ध योगी,योगाचार्य,संत, मुनि, कथाकार, दार्शनिक,लेखक,मजहब गुरु,साहित्यकार आदि भी हैं। इनमें इतनी हिम्मत और इतना विवेक भी नहीं हैं कि ये शरीर में आये सहज बदलाव को स्वीकार कर सकें। अस्तित्व के गहन संकेत को समझने की इनके पास बुद्धि नहीं है और धरती के लोग इन्हीं को अपना आदर्श मानते हैं।जब आदर्श ही हीन भावना से ग्रस्त होगा तो वह किसी के जीवन को क्या खाक दिशा देगा? स्वयं ही रास्ता भटके लोग दूसरों का क्या मार्गदर्शन करेंगे?
साहित्य सृजन के दौरान जिन साहित्यकारों को प्रसन्नता नहीं होती है, ध्यान रहे कि ऐसे साहित्यकार किसी पुरस्कार से भी कभी प्रसन्नता को प्राप्त नहीं होंगे।यह मनोवृत्ति सर्वत्र कार्यरत है। पुरस्कार छोटा हो या बड़ा हो,यही वास्तविकता है। साहित्य सृजन की एक अवस्था विशेष में जिस साहित्यकार को यह ज्ञान नहीं होता है,उसका साहित्य सृजन पूरी तरह से व्यर्थ तो नहीं होता है लेकिन उसके स्वयं के लिये वह कभी भी संतुष्टि देने वाला नहीं बन पायेगा। लेकिन सर्वत्र यही हो रहा है कि साहित्य सृजन में प्रसन्नता, संतुष्टि और तृप्ति खोजने की अपेक्षा जुगाड तुगाड करके पुरस्कार पाने की अंधी और भ्रष्ट दौड़ में पड़ जाते हैं। किसी के कैसे भी साहित्य सृजन से किसी अन्य को प्रेरणा मिलती हो या वह कुछ अच्छी -बुरी सीख ले लेता हो-यह भी गौण है। स्वयं के साहित्य सृजन से जब स्वयं ही प्रसन्नता नहीं मिलती हो,तो अन्य को यह मिल पायेगी, कुछ भी कहना सही नहीं होगा।निजता और परता के चक्कर में उलझाकर साहित्य सृजन को एक व्यापार बना दिया गया है। लेकिन इससे साहित्य सृजन का मूल उद्देश्य कहीं खो सा गया है। स्वयं प्रसन्न,संतुष्ट, तृप्त साहित्यकार ही दूसरों में इनकी फसल के बीजांकुर उत्पन्न कर सकता है। स्वयं दुखी,हताश,भ्रष्ट, जुगाड़ू साहित्यकार दूसरों में दुख,हताशा, अतृप्ति को ही भरने का काम करेगा। चहुंओर हो भी यही रहा है। इन पर कुछ टीका -टिप्पणी करो तो ये भिरड ततैयों के झूंड की तरह टूट पड़ते हैं। ऐसे साहित्यकार स्वयं लिखते हैं लेकिन अन्यों के लिखे को बहुत कम पढते हैं। विभिन्न साहित्यिक समूहों के कितने साहित्यकार ऐसे हैं कि जिनके पास अन्य उनके समकालीन या समकक्ष साहित्यकारों की पुस्तकें मौजूद हैं?एक प्रतिशत भी यह संख्या मिल जाये तो आश्चर्यजनक ही कहा जायेगा।
मूल विषय से हटकर अन्य किन्हीं विषयों की ओर ध्यान भटकाने की मनोवृत्ति पहले अधिकांशतः नेताओं में ही देखने और जानने को मिलती थी। लेकिन इक्कीसवीं सदी में यह मनोवृत्ति साहित्यकारों में भी बहुतायत से देखने और जानने को मिल रही है। इसे इन साहित्यकारों का मूल विषय से पलायनवाद कहें या उस विषय के प्रति इनकी अज्ञानता कहें या इनकी कोई पूर्वधारणा कहें या पूर्वाग्रह कहें या कोई जन्मजात भय कहें या फिर अपनी जड़बद्ध हो चुकी मान्यता की ओर अन्यों का ध्यान आकर्षित करने का तानाशाही ढंग कहें? आखिर जिस मूल विषय या समस्या को उठाया गया होता है,उस पर बात न करके यहां -वहां की बातें करना किसी व्यक्ति की सहज मानसिक अवस्था और व्यवस्था को अभिव्यक्त नहीं करता है।यह अवश्य किसी ऐसे मानसिक महारोग की ओर संकेत करता है, जिसने आधुनिक युग को अपने चंगुल में लेकर असहनशील और संवेदनहीन बना दिया है। कोई किसी की बात, समस्या या पक्ष को सुनना नहीं चाहता है।एक साहित्यकार कहे जाने वाले व्यक्ति के लिये तो यह और भी अधिक सोचनीय विषय है।आप पूर्व की बात करोगे तो ऐसे लोग पश्चिम की बात करेंगे।आप विज्ञान की बात करोगे तो वो मजहब को उठा लायेंगे।आप परीक्षा प्रणाली की बात करोगे तो वो खेती-बाड़ी पर चर्चा शुरू कर देंगे।आप भारतीय संविधान का जिक्र करोगे तो वो मनुस्मृति को लेकर आ जायेंगे।इस प्रकार की हरकतें करना जहां पर न्यायशास्त्र और तर्कशास्त्र के नियमों के विपरीत है, वहीं पर सामान्य संवाद के लिये भी यह उचित नहीं है।इसके कारण पिछले दो -तीन दशकों से किसी से किसी का सही तरीके से संवाद या चर्चा आदि हो नहीं पा रहे हैं।साहित्यिक संसार की गोष्ठियों, व्याख्यानों और चर्चाओं में इस प्रकार की मनोवृत्ति ने गहराई तक अपनी पैठ बना ली है। यदि कोई व्यक्ति इस पर कुछ वक्तव्य देने का प्रयास करता है, तो उसे साहित्यकारों द्वारा ही बहुमत से उपेक्षित और अपमानित किया जाता है।
अगली पीढ़ी का पिता बनने की प्रतियोगिता पशुओं में हर कहीं देखी जा सकती है। एक मादा से शारीरिक संबंध बनाकर नयी संतान पैदा करने के लिये नर से नर में खूनी प्रतियोगिता अक्सर होती है।इस प्रतियोगिता में कयी बार कमजोर नर मर भी जाते हैं लेकिन पीछे नहीं हटते हैं। सांड,झोटा,बकरा,हाथी,शेर, कुत्ते सभी पशुओं में सामान्यतः इस जंग या प्रतियोगिता या भिड़त को देखा जा सकता है। विभिन्न मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री, जीवशास्त्री,दर्शनशास्त्री,नीतिशास्त्री,कामशास्त्री आदि इसकी व्याख्या भिन्न- भिन्न ढंग से करते हैं।लेकिन क्या किसी रूप में यह प्रतियोगिता मनुष्यों में भी मौजूद है या नहीं? यदि मौजूद है तो किस स्तर पर? शारीरिक या प्राणिक या मानसिक या बौद्धिक या अन्य कुछ? भरपूर दूध या खेती-बाड़ी के लिये पशुओं की इस प्रतियोगिता में मनुष्य प्राणी सदैव से पशुओं का साथ देता आया है। हालांकि यह साथ मनुष्य प्राणी का निज स्वार्थ है। इससे पशुओं का कोई हित नहीं हो रहा है। पशुओं में यह प्रतियोगिता अगली पीढ़ी को सशक्त बनाने के लिये होती है, जबकि मनुष्य प्राणी पशुओं से भरपूर दूध और मांस की प्राप्ति के लिये या तो उसके बच्चों को मरने के लिये विवश कर देता है या फिर उस पशु को ही मारकर खा जाता है।यह क्रूरता की श्रेणी में आता है या मनुष्य प्राणी के लिये अपने अस्तित्व को बचाने का प्रयास? भौतिक विज्ञान के बढ़ते प्रभाव,भोजन के बनावटीपन, जीवन-शैली में खोखलेपन आदि के कारण उत्पन्न मनुष्य की कामुक अशक्तता से विवश होकर अब यह पशुओं वाली तकनीक मनुष्यों में भी अपनाई जाने लगी है। मनुष्य प्राणी की प्रजनन क्षमता पहले की अपेक्षा कमजोर होती गई है।नर हो या मादा दोनों में प्रजनन क्षमता का ह्रास देखा जा रहा है।इसीलिये चिकित्सा विज्ञान की मदद से संतान उत्पत्ति के लिये भिन्न- भिन्न ढंग देखने में आ रहे हैं।लगता है कि आगे -आगे बढ़िया संतान पैदा करने के लिये वीर्याणु दुकानों पर कीमत चुकाकर मिला करेंगे। यदि इसी तरह से पर्यावरण,भोजन, खेती-बाड़ी,जीवन-शैली से अंधाधुंध छेड़छाड़ की जाती रही तो शीघ्र ही ऐसा समय आ जायेगा।आपको कैसी संतान चाहिये,यह वीर्याणु के पैकेट पर अंकित मिलेगा।केश,आंखें, गोरेपन, कालेपन, सांवलेपन, लंबे, ठिगने,मोटे,पतले, बुद्धिमान संतान पैदा करने के सारे गुण पैकेट पर लिखे हुये मिलेंगे।एक तरफ से विकास होता देखा जाता है तो दूसरी तरफ से ह्रास शुरू हो जाता है। एकतरफा विकास का यही दुष्प्रभाव और दुष्परिणाम पहले भी सैकड़ों बार देखा गया है।वर्तमानकाल इसका अपवाद नहीं है। फिर फिर वही होकर रहेगा।जब -जब मनुष्य ने स्वयं को अस्तित्व से ऊपर समझा है,तब- तब यही हुआ है।आज फिर से भौतिक विज्ञानी में एकतरफा चमत्कारी खोजों के होने से मनुष्य स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने मूढता का शिकार होकर पहाड़ों,जंगलों, नदियों,जल, वायु,धरती,आकाश, खेती-बाड़ी, चिकित्सा आदि के साथ मनमानी कर रहा है।भीतरी समृद्धि कम होती जा रही है। इसकी वजह से नैतिकता, सद्भाव, करुणा,प्रेम,सह- -अस्तित्व, धैर्य, सहनशीलता, तार्किकता और न्यायप्रियता आदि में कमी आती जा रही है।
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डॉ. शीलक राम आचार्य
दर्शनशास्त्र- विभाग
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
कुरुक्षेत्र -136119

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