साहित्य

जीवन की डोर बड़ी कमज़ोर

कुलदीप सिंह रुहेला

जीवन की डोर बड़ी कमज़ोर,
पल-पल बदले इसका छोर।
हँसी भी आई, आँसू भी आए,
हर मोड़ पे कुछ सपने टूट जाएँ।

कभी धूप में जलता साया,
कभी बादल बन दर्द छाया।
साँसों की ये कच्ची माला,
हर मोती है किस्मत वाला।

आज है कल की क्या खबर,
कब रुक जाए ये रहगुज़र।
इसलिए मुस्कान सजा कर रख,
हर लम्हा जी भरकर रख।

नफरत छोड़, प्रेम को थाम,
यही जीवन का सच्चा काम।
डोर भले हो बहुत कमज़ोर,
पर इंसान बने मजबूत भरपूर।

कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!