
हर पन्नों पे कुछ तुम्हारी,
कुछ अपनी कहानी लिखती हूँ। यादों को शब्दों में पिरोकर बांधे रखती हूं।
कुछ कह पाती हूं,
तो कुछ बातें अनकही ही रह जाती हैं।
खामोशी से पहले कुछ निशानियाँ दे जाऊंगी।
खुद का एक हिस्सा,
तुझमें अपना छोड़ जाऊंगी।
कुछ ऐसी कहानी अपनी बना जाऊंगी।
जब कभी भी इन पन्नों को पलटोगे तुम,
कुछ आंसू की बूंदें स्वतः,
इन पन्नों पे गिर जाऐंगे।
तृषा सिंह
देवघर, झारखंड




