
बेटी कोई सौदा नहीं, तराजू में जो तोली जाए,
हंसी के बदले उसकी, क्यों कीमत बोली जाए।
अग्नि में सात फेरों की, प्रेम का हो विस्तार,
क्यों नोटों की गिनती से,मापा जाए परिवार।।
कन्या का सम्मान जहां, होता वही संस्कार,
दहेज की भूख ने छीना, कितनों का अधिकार।
मां की ममता, स्वाभिमान पिता का टूट जाता है,
दानव जब लालच का, रिश्तो को लूट जाता है।।
न सोने-चांदी की चाहत,ना बंगले की आस लगी,
प्रेम भरा बस मन हो , यही सच्ची सौगात लगी।
दहेज नहीं संस्कार दो, बेटियों को विश्वास दो,
समाज की तस्वीर, कुछ बेहतर कुछ खास लगी।
न नोटों से न सिक्कों से,नींव घर की टिकती है,
संस्कारों की ईंटों पर ही,सच में दुनिया बस्ती है।
लिया दहेज शर्म करो, इंसान बनो,इंसाफ़ करो,
अस्मत से बढ़कर बेटी की, कोई न दौलत सस्ती है।।
कन्या का सम्मान जहाँ, बसता वहीं संस्कार,
दहेज की भूख ने छीना, कितनों का अधिकार।
जिस घर दिलकश भावों में बेटी को मिलता मान,
वहीं उज्ज्वल भविष्य गढ़ता, सशक्त परिवार।
दिनेश पाल सिंह दिलकश
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*



