
भारतीय साहित्य की परंपरा जितनी प्राचीन है, उतनी ही व्यापक और बहुरंगी भी है।यह हजारों वर्षों से वैदिक संस्कृत,लौकिक संस्कृत तथा इससे निर्गत विदेशीय भाषाओं लैटिन, हिब्रू, इटालियन, अरबी, रसियन तथा भारतीय भाषाओं तमिल, तेलगु, मलयालम, कन्नड़, गुजराती, असमी, पंजाबी, कश्मीरी, हिंदी आदि भाषाओं से होती हुई प्रवाहमान है। पाश्चात्य भाषा विज्ञानियों ने खुद को सभ्य और अन्यों को असभ्य मानकर चलने वाली उपनिवेशवादी विचारधारा से पूर्वाग्रहग्रस्त होकर उटपटांग कल्पनाएं की हैं। जिसकी लाठी, उसी की भैंस वाली कहावत भाषाविज्ञान में भी बहुतायत से मौजूद है। धनसत्ता, बलसत्ता और ज्ञानसत्ता के बल पर कुछ का कुछ सिद्ध कर देना इतिहास की काली सच्चाई है। भारतीय भाषाएं, दर्शनशास्त्र, संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, पुरातत्व, चिकित्सा, खेती-बाड़ी, व्यापार, प्रबंधन और विज्ञान इस पाश्चात्य पूर्वाग्रह से अछूते नहीं रहे हैं। भाषा परंपरा में हिन्दी और हरियाणवी भाषा का विशेष महत्व है। जहां पर हिन्दी बोलने, लिखने और समझने वाले लोगों की संख्या अंग्रेजी भाषा से भी अधिक ऊ, वहीं पर हरियाणवी के अधिकांश शब्द संस्कृत भाषा से निर्गत हैं। ध्यान से अध्ययन करने पर यह सहज ही समझा जा सकता है। हिन्दी भाषा ने जहाँ राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक जागरण और सांस्कृतिक एकता को स्वर दिया, वहीं हरियाणवी भाषा ने लोकजीवन, श्रम-संस्कृति और ग्रामीण यथार्थ को सशक्त अभिव्यक्ति प्रदान की। हरियाणवी पूरी तरह से क्षत्रियोचित और खेती-बाड़ी की भाषा है। हिंदी और हरियाणवी दोनों भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा दिलाने के लिए जिन साहित्यकारों ने निरंतर संघर्ष और साधना की है, उनमें डॉ. शीलक राम आचार्य का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है।
डॉ.शीलक राम आचार्य केवल लेखक या कवि ही नहीं हैं, बल्कि वे दर्शनशास्त्री, विचारक, योगी, आलोचक, संपादक और सांस्कृतिक चिंतक के रूप में भी स्थापित हैं। उनका साहित्यिक व्यक्तित्व बहुआयामी है। उन्होंने अपने लेखन और वैचारिक हस्तक्षेप के माध्यम से हिन्दी और हरियाणवी साहित्य को क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर निकालकर राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ा है। यही कारण है कि उनका साहित्य केवल साहित्यिक जगत् तक सीमित न रहकर दार्शनिक, नैतिक, तार्किक, वैचारिक,सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का वाहक बनता है।
हिन्दी साहित्य में शीलक राम आचार्य का योगदान विशेष रूप से वैचारिक और दार्शनिक लेखन के रूप में सामने आता है। उनकी पुस्तकों श्रीमद्भगवद्गीता राष्ट्रभाष्य,(खंड प्रथम, खंड द्वितीय, खंड तृतीय और खंड चतुर्थ) में श्रीमद्भगवद्गीता में निहित युद्धरुपी ‘कर्म-दर्शनशास्त्र’ का व्याख्यान उपलब्ध है। उनकी काव्यात्मक पुस्तक ‘भगवान का गीत’ भारतीय दार्शनिक चेतना की आधुनिक काव्यात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है, जिसमें गीता, उपनिषद और समकालीन जीवन-दृष्टि का सार समाहित है। इसी क्रम में उनकी कृति ‘भगवान बुद्ध का आर्य वैदिक सनातन हिन्दू दर्शन’ भारतीय दर्शनशास्त्र की निरंतरता और समन्वय पर गंभीर विमर्श प्रस्तुत करती है। इसमें सिद्धार्थ गौतम को एक आर्य वैदिक ऋषि कहा गया है, कोई नास्तिक मत का प्रणेता नहीं। विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं, पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित उनके 2000 से अधिक निबंध,आलेख और शोधपरक-आलेख सनातन भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शनशास्त्र,नीति, योगाभ्यास,राष्ट्र-बोध, शिक्षा, दार्शनिक -परामर्श और नैतिक-मूल्यों पर केंद्रित हैं। वे साहित्य को केवल मनोरंजन या भावुक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं मानते, बल्कि समाज को दिशा देने वाला सशक्त उपकरण स्वीकार करते हैं। उनके लेखन में भारतीय-दर्शनशास्त्र की स्पष्ट छाप दिखाई देती है, जिसमें वेद, आरण्यक, उपनिषद, षड्दर्शनशास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता, चार्वाक, आजीवक, तंत्रयोग,हठयोग, बौद्ध दर्शनशास्त्र, जैन दर्शनशास्त्र, स्वामी दयानंद सरस्वती, आचार्य रजनीश, जिद्दू कृष्णमूर्ति, राजीव भाई दीक्षित और गांधीवादी चिंतन का संतुलित समन्वय मिलता है। इतिहास दृष्टि में सीताराम गोयल, पुरुषोत्तम नागेश ओक, पंडित भगवद्दत आदि का वैचारिक चिंतन आचार्य जी के लेखन में मुखरित हुआ है।
डॉ. शीलक राम आचार्य आधुनिक समय की चुनौतियों पर भी गंभीर दृष्टि रखते हैं। उनकी महत्त्वपूर्ण कृति ‘विश्वगुरु आर्यावर्त भारत’—जिसे विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य माना जाता है—भारतीय संस्कृति, राष्ट्रबोध और वैश्विक भूमिका का विराट चित्र प्रस्तुत करती है। इस ग्रंथ के माध्यम से वे भारत की सनातन चेतना को आधुनिक वैश्विक संदर्भों से जोड़ते हैं। वे वैश्वीकरण, बाजारवाद, उपभोक्तावाद और सांस्कृतिक विघटन के प्रभावों को अपने लेखन में स्पष्ट रूप से रेखांकित करते हैं। उनका मानना है कि आज साहित्य के समक्ष सबसे बड़ा संकट उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता का क्षरण है। यदि साहित्य अपनी जड़ों से कट गया, तो वह समाज को दिशा देने की अपनी भूमिका खो देगा। इसी कारण वे हिन्दी साहित्य में भारतीय-नैतिक जीवन-मूल्यों, सांस्कृतिक चेतना और नैतिक उत्तरदायित्व के पुनर्स्थापन पर बल देते हैं।
आलोचक के रूप में डॉ. शीलक राम आचार्य की पहचान एक निर्भीक और संतुलित दृष्टा की है। वे किसी भी रचना या लेखक का मूल्यांकन प्रचार, पुरस्कार या प्रतिष्ठा के आधार पर नहीं करते, बल्कि उसकी वैचारिक प्रामाणिकता और सामाजिक प्रभाव को कसौटी बनाते हैं। उनकी आलोचना में न तो अंध-समर्थन है और न ही अनावश्यक विरोध, बल्कि एक जिम्मेदार और संवादधर्मी साहित्यिक दृष्टि दिखाई देती है। इससे हिन्दी साहित्य को गंभीर विमर्श और आत्ममंथन की दिशा मिली है।
हरियाणवी साहित्य के क्षेत्र में डॉ. शीलक राम आचार्य का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उनकी पुस्तक ‘राष्ट्रनायक: हमारा हरियाणा’ हरियाणा की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और राष्ट्रनिर्माण में भूमिका को रेखांकित करती है। इस कृति के माध्यम से उन्होंने हरियाणवी चेतना को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया है। लंबे समय तक हरियाणवी भाषा को केवल लोकबोली या हास्य-व्यंग्य की भाषा मानकर उपेक्षित किया गया, किंतु उन्होंने इस धारणा को तोड़ने का कार्य किया। उनका मानना है कि लोकभाषाएँ किसी भी समाज की आत्मा होती हैं और इनमें निहित अनुभव, श्रम और संघर्ष की संवेदना साहित्य को नई ऊर्जा प्रदान करती है।
आचार्य शीलक राम ने हरियाणवी भाषा में सृजन, आलोचना और वैचारिक विमर्श को लगातार प्रोत्साहित किया। चौधरी छोटूराम पर लिखी गई उनकी कृति ‘मुक्तिदाता चौधरी छोटूराम’ और अमृतकलश–धनपत सिंह निंदाणा’ जैसे ग्रंथ हरियाणा के लोकनायकों को राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि हरियाणवी भाषा केवल मंचीय मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें गंभीर साहित्य, दर्शन और सामाजिक चिंतन की पूरी क्षमता मौजूद है। उनके प्रयासों से हरियाणवी लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें और ग्रामीण जीवन की सजीव अभिव्यक्ति राष्ट्रीय मंचों तक पहुँची। हरियाणा राज्य के एक अन्य उपेक्षित लोककवि जगत्गुरु स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती के जीवन और जीवन-दर्शन पर दर्शनशास्त्र-विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र में स्थापित ‘जगत्गुरु ब्रह्मानन्द चेयर’ के अंतर्गत दो विशालकाय शोध -ग्रंथ अभी- अभी प्रकाशित हुये हैं।उनके नाम हैं- ‘जगत्गुरु ब्रह्मानंद सरस्वती दर्शनामृत’ और श्री ब्रह्मानंद दर्शन भास्कर’। ‘श्री ब्रह्मानंद दर्शन भास्कर’ सरल हिंदी में एक विशालकाय महाकाव्यात्मक कृति है।
‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ के अंतर्गत आचार्य जी की अभी तीन पुस्तकें प्रकानशाधीन हैं। इनमें हजारों वर्षों पुरातन समृद्ध भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पहलुओं पर प्रकाश डाला गया है। ‘दार्शनिक परामर्श’ जैसे नये विषय पर भी आचार्य जी की एक पुस्तक ‘दार्शनिक परामर्श : सत्यता, वास्तविकता और भ्रम’ प्रकाशनाधीन है। जहां तक योगाभ्यास की बात है, महर्षि पतंजलि के ‘योगसूत्र’ की विस्तृत व्याख्या का लेखन कार्य चल रहा है। ‘हरियाणवी योगसूत्र’ पहले ही प्रकाशित हो चका है। जीवन -दर्शनशास्त्र विषय पर आचार्य जी की छह पुस्तकें काफी पहले प्रकाशित हुईं थीं। उन सबमें दर्शनशास्त्र जैसे विषय को दैनिक जीवन से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है।
उन्होंने विभिन्न साहित्यिक संगोष्ठियों, सेमिनारों और सम्मेलनों में हरियाणवी भाषा को सम्मानपूर्वक प्रस्तुत किया। इन आयोजनों के माध्यम से उन्होंने यह संदेश दिया कि क्षेत्रीय भाषाएँ किसी भी तरह से राष्ट्रीय भाषिक चेतना से अलग नहीं हैं। इससे न केवल हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान सशक्त हुई, बल्कि क्षेत्रीय साहित्य के महत्व पर भी राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर चर्चा आरंभ हुई। उनके प्रयासों ने नई पीढ़ी के लेखकों को अपनी मातृभाषा में सृजन के लिए प्रेरित किया।
आचार्य शीलक राम का साहित्यिक योगदान उनकी पुस्तकों के माध्यम से भी व्यापक रूप में सामने आता है। उन्होंने विभिन्न विधाओं में पचास से अधिक पुस्तकों की रचना की है, जो हिन्दी और हरियाणवी साहित्य के साथ-साथ भारतीय दर्शन, संस्कृति और राष्ट्रबोध को समर्पित हैं। उनकी प्रमुख कृतियों में “भगवान का गीत”, ‘विश्वगुरु आर्यावर्त’, ‘राष्ट्रनायक: हमारा हरियाणा’, ‘मुक्तिदाता चौधरी छोटूराम’, ‘भगवान बुद्ध का आर्य वैदिक सनातन हिन्दू दर्शन’, ‘अमृतकलश–धनपत सिंह निंदाणा’ सहित अनेक वैचारिक, दार्शनिक और साहित्यिक ग्रंथ शामिल हैं।
इन पुस्तकों में आचार्य शीलक राम ने भारतीय संस्कृति की जड़ों को आधुनिक संदर्भों से जोड़ा है। उनकी कृतियाँ केवल ऐतिहासिक या धार्मिक विवरण नहीं हैं, बल्कि वे समकालीन समाज को आत्मबोध कराने का प्रयास करती हैं। ‘विश्वगुरु आर्यावर्त भारत’ जैसे महाकाव्यात्मक ग्रंथ के माध्यम से उन्होंने भारत की सनातन चेतना, सांस्कृतिक विरासत और वैश्विक भूमिका को व्यापक काव्यात्मक फलक पर प्रस्तुत किया है। वहीं ‘भगवान का गीत’ और ‘बुद्ध दर्शन’ से संबंधित उनकी पुस्तकें भारतीय दार्शनिक परंपरा की आधुनिक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।
हरियाणा के सामाजिक और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर लिखी गई उनकी कृतियाँ—विशेष रूप से चौधरी छोटूराम और धनपत सिंह निंदाणा पर आधारित ग्रंथ—क्षेत्रीय इतिहास को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में स्थापित करती हैं। इन पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने यह सिद्ध किया कि क्षेत्रीय नायक और लोकपुरुष भी राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण स्तंभ होते हैं।
आचार्य शीलक राम का संपादकीय कार्य भी उनके साहित्यिक योगदान का एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली पक्ष है। विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि वे ग्यारह अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं के मुख्य संपादक हैं। इनमें ‘प्रमाण शोध-पत्रिका’ (ISSN 2249-2976) सहित दर्शन, साहित्य, संस्कृति, योग और सामाजिक अध्ययन से जुड़ी अंतर्राष्ट्रीय रैफरीड जर्नल्स शामिल हैं। इन पत्रिकाओं के माध्यम से उन्होंने हिन्दी और हरियाणवी भाषा में हो रहे शोध को वैश्विक अकादमिक मंच प्रदान किया है। इस भूमिका में उन्होंने हिन्दी, हरियाणवी, दर्शनशास्त्र, संस्कृति और सामाजिक-विमर्श से जुड़े गंभीर शोध को वैश्विक अकादमिक मंच प्रदान किया है। उनके संपादन में प्रकाशित शोध-पत्र न केवल भारत, बल्कि विदेशों में भी पाठकों और शोधार्थियों द्वारा संदर्भित किए जाते हैं। वे अनेक शोध-पत्रिकाओं और साहित्यिक जर्नलों से जुड़े रहे हैं। उनके संपादन में प्रकाशित पत्रिकाओं ने हिन्दी और हरियाणवी साहित्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध-जगत् से जोड़ने का कार्य किया। इन मंचों के माध्यम से युवा लेखकों, शोधार्थियों और गंभीर विचारकों को अपनी बात कहने का अवसर मिला।
एक शिक्षक और मार्गदर्शक के रूप में भी डॉ. शीलक राम आचार्य की भूमिका उल्लेखनीय रही है। इसके साथ-साथ उनका संगठनात्मक योगदान भी अत्यंत प्रेरक है। वे आचार्य अकादमी, चुलियाणा (रोहतक) के संचालक हैं, जिसके माध्यम से उन्होंने साहित्य और संस्कृति को जन-आंदोलन का रूप दिया है। इस अकादमी के अंतर्गत वे अब तक दो हजार से अधिक लेखकों, साहित्यकारों और चिंतकों को सम्मानित कर चुके हैं। यह कार्य केवल औपचारिक सम्मान तक सीमित नहीं है, बल्कि नवोदित और संघर्षशील रचनाकारों को आत्मविश्वास और पहचान प्रदान करने का सशक्त माध्यम बना है।
आचार्य अकादमी के माध्यम से डॉ. शीलक राम आचार्य साहित्य को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। वे मानते हैं कि सम्मान और प्रोत्साहन से ही सृजनशीलता का विकास होता है। इसी दृष्टि से उन्होंने क्षेत्रीय लेखकों को राष्ट्रीय मंच से जोड़ने का सतत प्रयास किया है। उन्होंने विश्वविद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों को साहित्य और दर्शनशास्त्र के प्रति जागरूक किया तथा उन्हें अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति आत्मगौरव की भावना से जोड़ा। उनके निर्देशन में किए गए शोध-कार्य हिन्दी और हरियाणवी साहित्य को अकादमिक मान्यता दिलाने में सहायक बने। उन्होंने यह सिद्ध किया कि क्षेत्रीय साहित्य भी शोध और अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध और संभावनाशील है।
साहित्य के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक एकता को मजबूत करने के लिए आचार्य शीलक राम खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों को भी समान महत्व देते हैं। आचार्य अकादमी के तत्वावधान में वे हर वर्ष होली और दिवाली जैसे पर्वों के अवसर पर खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करवाते हैं। इन प्रतियोगिताओं में सभी प्रतिभागी खिलाड़ियों को नकद पुरस्कार, ट्रॉफी और प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाते हैं। उनका मानना है कि खेल प्रतियोगिताएँ अनुशासन, सौहार्द और सामूहिकता की भावना को सुदृढ़ करती हैं, जो किसी भी स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए आवश्यक हैं। इसके अलावा आचार्य अकादमी के माध्यम से हर वर्ष श्रीमती हेमलता हिन्दी साहित्य (गद्य, पद्य) पुरस्कार, स्वामी दयानंद सरस्वती दर्शनशास्त्र, राष्ट्रवाद, सनातन वैदिक धर्म व संस्कृति पुरस्कार, राजीव भाई दीक्षित भारतीय इतिहास, आयुर्वेद, स्वदेशी व राष्ट्रभक्ति पुरस्कार, चौधरी छोटूराम किसान, मजदूर और शिक्षा पुरस्कार, बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर समानता व समता पुरस्कार डॉ. शीलक राम आचार्य की देख रेख में दिए जाते है। जिसमे अंतर्गत इनाम राशि, प्रमाण-पत्र व स्मृति चिन्ह दिए जाते हैं।
डॉ. शीलक राम आचार्य के साहित्य का केंद्रीय स्वर राष्ट्रबोध, दार्शनिक और सांस्कृतिक चेतना है। उनकी लगभग सभी प्रमुख पुस्तकों में यह स्वर समान रूप से उपस्थित है—चाहे वह ‘भगवान का गीत’ हो, ‘विश्वगुरु आर्यावर्त’ हो या हरियाणा के लोकनायकों पर आधारित उनके विभिन्न ग्रंथ हों। वे मानते हैं कि भाषा और साहित्य किसी भी राष्ट्र की आत्मा होते हैं। यदि इन्हें कमजोर किया गया या केवल बाजार के हवाले छोड़ दिया गया, तो राष्ट्रीय पहचान भी संकट में पड़ जाती है। इसी कारण उनका साहित्य भारतीय संस्कृति, परंपरा और आत्मगौरव को केंद्र में रखकर आगे बढ़ता है।
आज के समय में जब भाषा और साहित्य तात्कालिक लोकप्रियता, सोशल मीडिया और बाजार के दबाव में दिशाहीन होते जा रहे हैं, डॉ. शीलक राम आचार्य का साहित्य एक वैचारिक प्रतिरोध के रूप में सामने आता है। वे साहित्य को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं और लेखकों को सजग, निर्भीक और मूल्यनिष्ठ बनने की प्रेरणा देते हैं।
आचार्य जी पिछले तीन दशकों से ‘वैदिक योगशाला’ के अंतर्गत सनातन वैदिक योगाभ्यास नियमित रूप से करवा रहे हैं। व्हाट्स एप आदि सोशल मीडिया के माध्यम से हिंदी और हरियाणवी में इस पुनीत कार्य को करके हजारों लोगों तक इसकी पहचान हुई है। योगाभ्यास केवल थ्योरिटिकल न होकर अनुशासनपरक, अभ्यासपरक, साधनापरक और आचारपरक है-आचार्य शीलक राम सतत् इसी जीवन-शैली, जीवन-चर्या और जीवन-दर्शन को लेकर प्रयासरत हैं।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि आचार्य शीलक राम हिन्दी और हरियाणवी साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में निरंतर सक्रिय और समर्पित हैं। उनका योगदान लेखन, आलोचना, संपादन, शिक्षण, योगाभ्यास और संगठन—सभी स्तरों पर प्रभावशाली रहा है। हिन्दी और हरियाणवी साहित्य के इतिहास में उनका नाम एक ऐसे साहित्यकार के रूप में अंकित रहेगा, जिसने भाषा को केवल अभिव्यक्ति का साधन नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक-चेतना, तार्किकता, अनुसंधान, विश्लेषणात्मक चिंतन, स्वदेशी और राष्ट्र-निर्माण का सशक्त माध्यम बनाया है।
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डॉ. सुरेश कुमार जांगडा
राजकीय महाविद्यालय सांपला
जिला-रोहतक
(हरियाणा)
मोबाइल : 9050407192




