
प्रिय आंग्ल नववर्ष, नमस्कार तुम्हें प्रणाम,
हर बरस आते हो तुम, कहलाते फिर भी “नव” नाम।
भारतीय परंपरा में अतिथि देव समान,
ऐसे अतिथि हो तुम, जो टिक जाते साल तमाम।
कैलेंडर बदले मजबूरी, ठिठुरे तन-मन सारे,
रजाई में दुबके लोग, शुभकामनाएँ बिखारे।
“हैप्पी न्यू ईयर” कहते ही, मुँह से धुआँ उड़ जाए,
कंपकंपी में हँसी कहाँ, बस दाँत कटकटाए।
हमारा चैत महीना देखो, हँसता-खिलखिलाता,
फागुन की मस्ती संग, जीवन रंग जमाता।
पर तुम आए ठंड लिए, कोहरे का झंझावात,
नव कहलाने पर भी, लगे पुराने हालात।
यहाँ तो SIR का पहरा, काग़ज़ पूरे लाना,
विपक्षी पूछताछ करे, आसान नहीं आना।
कहो 2025 में, तुम आए कैसे भाई,
पैदल पथ कठिन बहुत, लुटेरे दें दिखाई।
बस में आग का डर है, ट्रेनें धुँध में लेट,
टिकट कंफर्म न होता, यात्री सब हैं खिन्न-खेद।
विमान से आओ तो भी, शरीफों की है शामत,
एयरपोर्ट की बेइज्जती, उड़ानों की अनिश्चित आदत।
इसलिए कह दें स्पष्ट हम, बुरा न तुम मानो,
फरवरी-मार्च में आना, या आगे की ठानो।
2027-28 भी चले, समय का क्या है रोना,
हम तहे दिल से करते हैं, स्वागत – यही है कहना।
डाॅ सुमन मेहरोत्रा
मुजफ्फरपुर, बिहार



