साहित्य

दो जून की रोटी 

डॉ गीता पाण्डेय

अपनी दृढ़ संकल्पों से ही श्रमिक भाग्य अपना लिखता।

संघर्षों के अंँधियारों में, उसका रूप सदा दिखता।।

 

श्वेत बहा कर राह बनाते, श्रम का दीपक तब जलता।

हर बाधा को पार करे वह, साहस उर में है पलता।।

 

अन्न उगाए बनकर दाता, सींच पसीने से धरती।

हरी भरी जब वह दिखती है, उसे प्रफुल्लित तब करती।।

 

अपनी मंजिल पाने को वह, नित आगे बढ़ता रहता।

परिवार पालने को अपना, कष्ट अनेकों है सहता।।

 

कभी-कभी श्रम करने पर भी, दाम नहीं जब मिल पाता।

नित्य कमा कर खाने वाला, तब भूखा ही रह जाता।।

 

शीतल मंद पवन जब बहती, हर लेती उसकी पीड़ा।

रंग-बिरंगे पुष्पों से वह, करता मधुमय है क्रीड़ा।।

 

दो जून मास की तिथि आई, बात सभी जन ये मानो।

जिसको दो जून मिले रोटी , भाग्यवान उसको जानो।।

 

जो हराम की रोटी खाते, श्रम का मूल्य नहीं समझे।

खून गरीबों का है चूसें, माया में रहते उलझे।।

 

लंबी चौड़ी हाँका करते, खाते घी बोर चपाती।

कभी बीतती जब खुद पर है, तब बात समझ में आती।।

 

पर अंत बुरा इनका होता है, अनुकरण कभी मत करना।

दीन-दुखी यदि मिले राह में, उनकी झोली तुम भरना।।

 

डॉ गीता पाण्डेय ‘अपराजिता’

सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश

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