
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ विश्व की ऐसी एक संस्था है जो अनवरत 100 सालों से राष्ट्र जागरण के कार्य में लगी है स्वाधीनता के पूर्व स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारतीय समाज में विद्यमान कुरीतियों कमियों को दूर कर और लोगों को विदेशी सत्ता का प्रतिवाद प्रतिरोध प्रतिकार करने के लिए तैयार कर रही थी। इसके उद्देश्यों में राष्ट्र जागरण कर लोगों को वैचारिक रूप से मानसिक रूप से भारतीयता सनातन संस्कृति परंपरा के साथ-साथ विज्ञान जगत के नूतन अभिनव प्रयोगों को समाहित करना था ।।अपने 100 साल की इस अथक यात्रा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने वर्तमान परिदृश्य को दृष्टिगत हुए राष्ट्र को स्थाई रूप से मजबूती प्रदान करने के लिए पंच प्रण की संकल्पना की ।।वस्तुत:संघ की संकल्पना ही नहीं है बल्कि इसे क्रियान्वित करने के लिए देश के 924 जिलों में इसके कार्यकर्ता स्वयंसेवक गांव गांव पहुंच करके डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार के दूरदर्शी विचार को जन-जन पहुंचाने का उत्कृष्ट कार्य कर रहे हैं यह पंच परिवर्तन वास्तव में राष्ट्र समुन्नयन का एक आधार स्तंभ है देश का वह मजबूत किला है विकसित भारत का रोड मैप है जिस पर चल करके भारत विश्व गुरु का खोया हुआ अपना गौरव ना केवल वापस ला सकता है बल्कि पूरे विश्व में सामाजिक समरसता मानवता स्व का भाव जागृत करके शांति समृद्धि खुशहाली का कारक बन सकता है
अपनी 100 वर्ष की शतकीय यात्रा पूर्ण कर संघ इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि हिमालय की बात अडिग और सशक्त इस गौरवशाली भारत को अखंड समृद्ध व समावेशी बनाए रखने के लिए कुछ आधारभूत तत्वों की नितांत आवश्यकता है राष्ट्र अभ्युदय और राष्ट्रीय उत्थान बिना कुछ निश्चित उद्देश्यों के पूर्ण के बिना पूरा नहीं किया जा सकता इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए संघ ने पांच संकल्प लिए जिनमें सामाजिक समरसता नागरिक कर्तव्य कुटुंब पर्यावरण व स्व का भाव प्रमुख हैं
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सत्य सनातन शाश्वत भारत के स्वरूप को बनाए रखने के लिए सामाजिक समरसता पर बल दिया वास्तव में वैदिक काल से ही भारत में वसुधैव कुटुंबकम की भावना पुष्पित पल्लवित होती रही कोई छुआछूत नहीं जातिवाद नहीं इसका ज्वलंत उदाहरण भगवान राम का शबरी के झूठे किन्तु भाव व प्रेम से सने बेर ग्रहण करना था लेकिन सनातन संस्कृति के ताने-बाने को कमजोर करने के लिए जातिवाद का जहर घोला गया छुआछूत के नाम पर समाज को तोड़ने का कार्य जोक के समान जिनकी चाल टेढ़ी होती है ‘चलहिं जोंक जिम वक्र गति यद्यपि सलिल सामान’ भारत के इस खूबसूरत स्वरूप को स्वीकार न सके उन्होंने लोगों के मन में जन-जन में कटुता राग द्वेष और फूट के भावना को डालने के लिए उनमें छुआछूत का बीजारोपण किया अस्पृश्यता हमारे समाज के बहुत बड़ी कमजोरी बन गई हम ऐसे कुटिल लोगों का समुचित प्रतिकार ना कर सके और हमारा समाज जातियों में बंट गया जिससे हम कमजोर हुए इससे विदेशी ताकत भारत और भारतीयता का बुरा चाहने वाले लोगों को बल मिला।। आज हम सबको आपसी एकता को अक्षुण्ण रखने के लिए आपसी सद्भाव और भाईचारे को बनाए रखने के लिए छुआछूत नामक इस बीमारी को सदैव के लिए तिलांजलि देनी होगी
भारत भूमि अनंत काल से ही प्रकृति का पुजारी रहा प्रकृति के संरक्षण में रहकर के ऋषियों मुनियों तपस्वियों ने धर्म अध्यात्म वेद और विज्ञान पर चर्चा परिचर्चा करके इसे गतिशीलता प्रदान की लेकिन आज हम सब स्वार्थिलिप्सा में जाने अनजाने में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं जो हमारे लिए खतरे का कारक बन गया है हमें अपने पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए जीव जन्तु जल जमीन जंगल का संरक्षण करना होगा पर्यावरण संतुलन को बनाए रखने पर जोड़ देना होगा ताकि हम खुली हवा में सांस ले सके हमें पीने का स्वच्छ पानी उपलब्ध हो सके वास्तव में जीव जंतु वनस्पति और मानव एक दूसरे के पूरक एक के अभाव में दूसरे की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती तो फिर इनके साथ छेड़छाड़ मानवता के साथ छेड़छाड़ होगा अतः वृक्षारोपण नदी जल जंगल को सजोना है ।।यह हमारे लिए पुनीत कर्तव्य ही नहीं वर्तमान आवश्यकता है
परिवार हमारे समाज की मूलभूत इकाई है यह परिवार मातृ सत्तात्मक प्रतिष्टत्तात्मक आदि रूपों में होती थी हमारे परिवार रक्त संबंध से बना था परिवार से समाज और समाज का बड़ा रूप राष्ट्र ।।लेकिन आज हम सब पश्चिमी देशों का अंधा अनुकरण करके जिस तरह से पारिवारिक भावनाओं को ठेस पहुंचा रहे हैं परिवार टूट रहे समाज क्षत विक्षत हो रहा है वह राष्ट्र के लिए खतरा है एक बालक परिवार से ही सीखता है परिवार ही व्यक्ति की प्रथम पाठशाला है वहां उसको जैसी शिक्षा मिलेगी जैसे विचार मिलेंगे वहीं विचार वही भाव बाद में उसकी स्वभाव में समाहित हो जयेगी।। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने तो यहां तक कहा मैं जो कुछ भी हूं उसके लिए मैं अपने देवी स्वरूप माता का,ऋणी हूं किसी अन्य विद्वान का कथन है कि तुम मुझे साठ अच्छी माताएं दो मैं तुझे एक सशक्त राष्ट्र दे सकता हूं वीर शिवाजी छत्रसाल को प्रेरणा उनके परिवार से ही मिली।। आज हमें परिवार में जो पारिवारिक दायित्व संबंध है उनको अच्छा रखना है मजबूत है ऐसा संघ का मानना है अगर परिवार सशक्त हो जाएगा तो वह दिन दूर नहीं जब राष्ट्र में एकता विश्वास सौहार्द प्रेम अपनत्व का संचार होगा और तब सच्चे अर्थों में हम वसुधैव कुटुंबकम के भाव को साकार कर सकेंगे
पांच परिवर्तन की अगली कड़ी के रूप में संघ ने स्वदेशी व स्वास्थ्य के भाव को अंगीकार कर भारत को समर्थ व विकसित बनाने का एक खाका खींचा है कहां भी गया है स्वालंबन की एक झलक पर न्योछावर कुबेर का कोष हमें स्वदेशी के भाव को ग्रहण करना चाहिए स्थानीय उत्पादों वस्तुओं को क्रय करके हम अपने आसपास अपने समाज को मजबूत कर सकते हैं हम अपने गांव समाज आसपास के लोगों से वस्तुओं का खरीद करके उनको मजबूत बनाएंगे ना की बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जो यहां से माल लेकर के अपने राष्ट्र को समुन्नत करेंगे और फिर वही पैसा हमारे विरोधियों दुश्मनों को देकर के भारत व भारतीयों के लिए संकट पैदा करेंगे कहते हैं।। यदि हमारा आसपास स्वस्थ होगा मजबूत होगा तो हम भी मजबूत होंगे स्वस्थ होंगे हम अपने आप को मजबूत बनाए रखते हुए अपने स्व के भाव को अंगीकार करके विदेशी वस्तुओं से दूरी बनाना है
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विचार है कि पंच परिवर्तन के माध्यम से न केवल सामाजिक बदलाव लाने का बल्कि राष्ट्र को शिखर पर ले जाने का।। उसमें नागरिक कर्तव्य अत्यंत महत्वपूर्ण है हमें अपने अधिकार के साथ-साथ कर्तव्यों का ज्ञान भान होना चाहिए दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए सड़क पर किस तरह से चलना चाहिए ऊर्जा संरक्षण सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा लोगों के साथ प्रेमभाव शिष्टाचार यह सब हमारे अपने कर्तव्य हैं अगर हम अपने इन कर्तव्यों का समुचित निर्वहन करेंगे तो वह दिन सन्निकट होगा जब हम एक बार पुनः परम वैभवम् स्वरूप को प्राप्त कर सकेंगे।।
संघ अपने राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य की पूर्ति के लिए किसी अन्य संस्था अथवा सरकार पर निर्भर नहीं अपने निस्वार्थ कार्यकर्ताओं के माध्यम से स्वयंसेवकों की टोली लेकर के गांव गांव घर-घर संपर्क करके इस महनीय कार्य में उद्यत है और यही कारण है कि आज इसके कटु आलोचक भी इसकी भूरि भूरि प्रशंसा करते नहीं थक रहे ।।संघ का पंच प्रण पंच परिवर्तन नहीं अपित गौरवशाली भारत का मूल मंत्र है जो नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमे के उद्घोष के साथ विकसित भारत का परम वैभवम भारत का द्वार खोलता है
सत्यदेव तिवारी सत्येन्द्र
शिक्षाविद व राजनीतिक विश्लेषक



