साहित्य

पथिक

संजय मृदुल

“ए भाई! रुको ज़रा। कहाँ जा रहे हो?”
“बस थोड़ा आगे ही जा रहा हूँ। कहिए, आपको क्या परेशानी है?”
“नहीं नहीं। कोई परेशानी नहीं है। बस आपको कुछ बताना था।”
“क्या बताना है भाई साहब?”
“बस आप इस चौराहे से आगे जायेँ तो थोड़ा सावधान रहिएगा।”
“क्यों? ऐसा क्या है चौराहे से आगे?”
“सम्हल कर जाइयेगा जनाब आगे। ख़तरा है आगे। बीमा है या नहीं आपका? हेल्थ इंश्योरेंस करवाया है न?”
“अरे बोलिए भी ऐसा क्या है वहाँ?”
“क्या क्या बताऊँ? आगे रेप के आरोपी माला डाले खड़े हुए हैं। नेता हिन्दू मुस्लिम को लड़ाए पड़े हैं। हिन्दू त्यौहार के अलावा कोई और त्यौहार मनाना अपराध है बता रहे हैं। छोटी आँखो वालों को विदेशी बता रहे हैं। काले रँग वाले को बांग्लादेशी बता रहे हैं। चौक से आगे जाओगे तो पुल पड़ेगा, सम्हल कर जाना आजकल पुल यूँ ही गिरे जा रहे हैं। सड़क धंस जा रही है। इसलिए हौले हौले जाना। किसी अनजान से बात मत करना। एक शेर सुना है न तुमने – कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से।”
“अरे भाई! डरा क्यों रहे हो मुझे। मुझे तो जाना ही पड़ेगा। कोई और रास्ता नहीं है मेरे पास। लौटना मुमकिन नहीं है मेरे लिए। लम्बा सफ़र है मेरे सामने।”
“हां मालूम है मुझे। मैं भी ऐसे ही चला था पिछले चौराहे से आगे। जो झेला, जो भुगता, जो भी पाया वही बता रहा हूँ तुम्हें। अब तुम्हें भी उसी सफ़र में आगे जाना है। अब तुम्हारी जिम्मेदारी है आगे सम्हालने की।”
“जी बड़े भाई! आपकी बात का ध्यान रखूंगा। सम्हल सम्हल कर चलूँगा। जो आपके साथ हुआ वैसा कुछ न हो कोशिश करूंगा। न कोई मणिपुर, न केरल, न छत्तीसगढ़, न कोई देहरादून। मैं प्रार्थना करूंगा कि न कोई बलात्कार हो न हत्या। जैसा आपके साथ बीता वैसा मेरे साथ न गुजरे।”
“भगवान तुम्हारी कामना पूरी करे छोटे भाई। शुभ यात्रा।”
©संजय मृदुल

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