साहित्य

पलों की परछाई

लक्ष्मी दीक्षित

 

जो गुजर गया उसको भूल जाते हैं लोग,
नए साल की खुशियों में डूब जाते हैं लोग।

पर वक्त की लहरों में जो बह गया पीछे,
उसकी परछाई को पलकों के नीचे छुपाते हैं लोग।

जो बीत गया वह भी तो दिल का एक हिस्सा था,
मेरे जीवन से जुड़ा उसमें एक अनकहा किस्सा था।

वो नाज़, वो ठहाके, वो ख्वाबों के चरागाह,
मेरे वजूद का वही तो बेशकीमती हिस्सा था।

माना कि नई सुबह की धूप बहुत सुनहरी हैं,
पर पुरानी यादों की जड़ें भी बहुत गहरी हैं।

उन पुराने कूचों ने ही नई गली का पता दिया,
गुजरे हुए हर लम्हे ने मुझमें एक शोला जगा दिया।

गुज़ारिश कर लो बेशक रब से कि ये साल बहुत अच्छा हो,
पर बीती हुई यादों का भी दिल में एक गुच्छा हो।

कि कैलेंडर बदलते रहेंगे कारवां बढ़ता रहेगा
मां के पेट से मरघट तक यह सफर यूं ही चलता रहेगा।

© लक्ष्मी दीक्षित
ग्वालियर मध्यप्रदेश

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