साहित्य

जीवन सत्य

मंजुला शरण

कैसा रोना कैसा गाना ,
यही सत्य है जीवन का ।

क्या मानव , क्या पल्लव।
एक सार है जीवन का …
मैं पल्लव हूँ आम का ।
किसलय की रक्तिम आभा में,
सुरभित था शैशव मेरा ।
हरित पर्ण बन निखरा था
यौवन मेरा।
मंगल तोरण का मैं ही बाना ।

कैसा रोना कैसा गाना
सत्य यही है जीवन का ।

बंधते थे मुझसे ही
तोरण बंदनवार….
मंगल घट का मैं था साथी
हर बार ।
शुभता का मैं सूचक
शुचिता का आधार।
किन्तु जीवन है क्षणभंगुर..
लगा है आना जाना ।

कैसा रोना कैसा गाना
सत्य यही है जीवन का।

कर्म ही नियति का संदेश
मिले चाहे कोई भी वेश ।
कहता है जीवन दर्शन ….
होना है सब को शेष ।
रोग- शोक- जरा सब मिथ्या ,
फिर क्यो होती है व्यथा ?
अर्ध हरित और अर्ध पीत
सब को है अतीत हो जाना ।

कैसा रोना कैसा गाना
सत्य यही है जीवन का।

मंजुला शरण
राँची, झारखण्ड़।

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