
हो संस्कार घरौंदा अपना।
पुरुखों का पूरा हो सपना।।
बच्चों को भी राह दिखाना।
अपने कुल की रीत निभाना।।
संस्कारी जब बच्चे होते।
मान भरी फुलवारी बोते।।
सदा बड़ों का आदर करते।
हृदय सदा शीतलता भरते।।
मातु पिता संस्कार सिखाते।
अनुशासन का नियम निभाते।।
इससे घर आंगन है सजता।
संस्कारी जीवन जब बनता।।
मान प्रतिष्ठा यही बढ़ाता।
शांत सुसज्जित जीवन पाता।।
प्रथम पाठ यह घर का मानो।
जीवन भर की पूंँजी जानो।।
संस्कारी जीवन ही जीना।
गर्वित होगा मांँ का सीना।।
यही धरोहर हो जब सीरत।
लगा सके न कोई कीमत।।
देख रहा संस्कार बड़ों का।
कुनबा हो मजबूत जड़ों का।।
संयम धीरज धरना प्राणी।
संस्कारों की बोलो वाणी।।
नीलम अग्रवाल रत्न




