
ये गरीबी क्यों होती है, कोई पूछे तो बताना,
महलों की नींव में दबा है, झोपड़ों का अफ़साना।
कोई सोता रेशम ओढ़े, कोई ठंड से काँप जाए,
एक थाली में हीरा चमके, दूजी में सूखी छाया।
ये गरीबी क्यों होती है, कानून भी चुप रहता,
न्याय की आँखों पर पट्टी, सच का गला घुटता।
मेहनत यहाँ पसीना देती, फल कोई और खाए,
हल किसान के हाथों में, फसल कोई और पाए।
बच्चे सपने बेच रहे हैं, काग़ज़ की फैक्ट्री में,
किताबें धूल खा रही हैं, नेताओं की तक़दीर में।
माँ की ममता भूखी है, दूध भी अब उधार,
बाप की आँखों में बसता, हर रात एक सवाल।
ये गरीबी क्यों होती है, मंदिर–मस्जिद पूछें,
भगवान भी शायद शर्माए, जब भूखे बच्चे सूखें।
वोट के दिन याद आते हैं, हाथ जोड़कर आते,
जीत के बाद वही चेहरे, रास्ता तक भूल जाते।
ये गरीबी कोई कुदरत नहीं, ये तो रची कहानी,
कुछ के हिस्से आसमान, कुछ के हिस्से ज़मीं पुरानी।
जिस दिन सवाल गूँजेंगे, हर भूखे के स्वर में,
उस दिन टूटेगी ये जंजीर, इंसान के ही घर में।
कुलदीप सिंह रुहेला
सहारनपुर उत्तर प्रदेश




